कोतवाली से दो सौ मीटर की दूरी पर नकली नोटों का यह धंधा काफी दिनों से चल रहा था। लेकिन कोतवाली पुलिस अनजान थी। एटीएस वाराणसी ने जब गिरोह के दो सदस्यों को सठियांव में पकड़ा तो उनसे पूछताछ में जानकारी मिली। एटीएस ने ही कोतवाली पुलिस को जानकारी दी। जिले की स्वाट टीमों से लेकर एलआईयू तक को इस फर्जीवाड़े की भनक न चल पाने से पुलिस महकमे की नाकामी उजागर हो गई है।
नकली नोट छापने के मामले में गिरफ्तार आरोपी मो. मंसूर को कंप्यूटर का अच्छा ज्ञान है। पुलिस की पूछताछ में उसने बताया कि जब नोटबंदी लागू हुई तो नेपाल में नकली भारतीय करेंसी की आमद कम हो गई। इस दौरान बेरोजगारी हो गई और उसकी भी आमदनी बंद हो गई। एक बार मंसूर नेपाल के वीरगंज से दो हजार का नकली नोट लाया। लेकिन कागज खराब होने चला नहीं। इस पर उसने सोचा कि क्यों न खुद ही नकली नोट छापे जाएं।
इसके लिए उसने स्टांप पेपर का चुनाव किया। उसने लैपटाप, कलर प्रिंटर खरीद कर इस धंधे को शुुरू कर दिया। वह पहले से ही नकली नोटों के कारोबार से जुड़ा था, इसलिए उसे नकली नोटों को खपाने वाले युवकों को अपने साथ जोड़ने में परेशानी नहीं हुई। इस काम में उसने तालिब और उस्मान को भी साथ ले लिया। ये दोनों नकली नोटों को ग्रामीण क्षेत्रों में सप्लाई करने लगे।
मंसूर ने बताया कि वह एक लाख नकली नोट के बदले दस हजार रुपये लेता था। एसपी ने बताया कि नकली नोट छापने वाला युवक महज दूसरी कक्षा तक ही पढ़ा है लेकिन उसका दिमाग तेज है। नकली नोटों को उसने इस प्रकार से डिजाइन किया है कि वह पहली नजर में असली जैसा लगता है और सामान्य आदमी उसे पहचानने में धोखा खा सकता है।
पहले नेपाल से करता था धंधा
मऊ। पुलिस अधीक्षक ने बताया कि नकली नोट छापने के आरोप में दबोचा गया मो. मंसूर पूर्व में अपने दोनों साथियों के साथ नेपाल से नकली नोट लाकर क्षेत्र में खपाता था। लेकिन पुरानी करेंसी बंद होने पर इनका धंधा बंद हो गया। इस पर मंसूर ने नकली नोट छापना शुरू कर दिया।
चालीस हजार रुपये असली नोट के बदले आरोपी ग्राहक को एक लाख रुपये देते थे। पुलिस अधीक्षक ने बताया कि इन आरोपियों के बताने पर कुछ नाम सामने आए हैं, पुलिस अब इन लोगों के बारे में जानकारी कर रही है। जल्द ही इस गिरोह के और सदस्य पकड़े जाएंगे।