फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Vrindavan: जयपुर नरेश की दी गई जमीन पर बसे हैं श्रीबांकेबिहारी, पढ़ें पूरी कहानी

Thu, 01 Sep 2022 04:56 AM IST
Jeet Kumar अमर उजाला ब्यूरो, वृंदावन (मथुरा)।

सार

सन 1787 में बिहारीजी को लेकर सेवायतगण पुराने शहर के पास दुष्यंतपुर में पूर्व में जयपुर रियासत से दान में मिली भूमि पर एक छोटा मंदिर बनाकर उसी के आसपास रहने लगे, इसी क्षेत्र को अब बिहारीपुरा कहा जाता है।
विज्ञापन
ठाकुर श्रीबांकेबिहारी मंदिर - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

श्रीबांकेबिहारीजी का वर्तमान मंदिर जयपुर नरेश महाराजा जयसिंह द्वितीय के सुपुत्र महाराजा सवाई ईश्वरी सिंह द्वारा वर्ष 1748 में दी गईं 1.15 एकड़ भूमि पर बना है। उस वक्त ब्रज का एक बहुत बड़ा क्षेत्र जयपुर घराने के स्वामित्व में आता था। इससे पूर्व बिहारीजी छह बार अलग-अलग जगहों पर बने मंदिर में विराजमान रह चुके हैं।

विज्ञापन


ठाकुरजी के सेवायत एवं इतिहासकार आचार्य प्रहलाद वल्लभ गोस्वामी ने बताया कि श्रीस्वामी हरिदासजी द्वारा ईसवी सन 1543 (विसं 1569) में प्रादुर्भावित हुए बांकेबिहारीजी सर्वप्रथम 1607 तक लतामंडप में विराजित रहने के बाद 1719 तक रंगमहल में विराजमान रहे। उसी वर्ष करौली के तत्कालीन राजा कुंवरपाल द्वितीय की रानी के प्रेमाग्रह पर उनके साथ चले गए। 

बिहारीजी 1721 तक करौली में और 1724 तक भरतपुर में दर्शन देते रहे। वर्ष 1724 में गोस्वामी श्रीरूपानंदजी महाराज ठाकुरजी को वापस वृंदावन में पहुंचाने में सफल रहे लेकिन स्वयं शहीद हो गए। उनकी समाधि वर्तमान विद्यापीठ चौराहे के निकट बनी हुई है। सन 1787 तक बिहारीजी पुन: निधिवनराज में विराजित रहे।
विज्ञापन


1755 में ग्वालियर रियासत के अधीन आ चुके मथुरा के तत्कालीन न्यायाधीश प्रहलाद सेवा ने बिहारीजी का सेवाधिकार गोस्वामीजनों को सौंपने का एवं दूसरे पक्ष के प्रमुख दोषियों को बारह वर्ष के क्षेत्र निकालने का महत्वपूर्ण आदेश पारित किया।

सन 1787 में बिहारीजी को लेकर सेवायतगण पुराने शहर के पास दुष्यंतपुर में पूर्व में जयपुर रियासत से दान में मिली भूमि पर एक छोटा मंदिर बनाकर उसी के आसपास रहने लगे, इसी क्षेत्र को अब बिहारीपुरा कहा जाता है। इतिहासकार प्रहलाद वल्लभ ने बताया कि महाराजा सवाई मानसिंह प्रथम ने ही हरिदासजी के निधिवन की कई एकड़ भूमि के मालिकाना हक से संबंधित दस्तावेज जगन्नाथजी को सौंपे थे। 

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें