मथुरा। शहर में मंगलवार शाम 5 बजे जब श्रीकृष्ण जन्मस्थान से भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा रवाना हुई तो माहौल भक्तिमय हो गया। भगवान जगन्नाथ के जयकारे गूंजने लगे और भक्तों में रथ को खींचने की होड़ लग गई। जो व्यक्ति भीड़ के कारण रथ को नहीं खींच सका तो वह रस्सी को छूकर ही खुद को धन्य महसूस कर रहा था। रथयात्रा का स्वागत करने के लिए जगह-जगह भक्त आतुर दिखे।
श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान की प्रबंध समिति के सदस्य गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी ने ठाकुरजी की आरती कर, ‘जय जगन्नाथ स्वामी’ के घोष के साथ रथयात्रा का श्रीकृष्ण-जन्मस्थान से शुभारंभ किया। इससे पूर्व भगवान जगन्नाथ, अग्रज बलराम, बहन सुभद्रा व श्रीचक्र के विग्रह संकीर्तन की ध्वनि के मध्य सुसज्जित दिव्य काष्ठ रथ में विराजमान कराए गए। पूजाचार्यों द्वारा तीनों श्रीविग्रहों को दिव्य शृंगार व स्वर्णिम मुकुट धारण कराए गए। देश विदेश से आए श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के दर्शन कर अभिभूत हो उठे। श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान द्वारा परिसर में भगवान जगन्नाथ की आरती के बाद आम एवं हलुवा प्रसाद का वितरण किया गया। रथयात्रा के मार्ग में भी भक्तजनों को भात-प्रसाद का वितरण किया। रथयात्रा में सबसे आगे ढोल तासा पार्टी व बैंड के साथ ब्रजमंडल के गौड़ीय संकीर्तन मंडल के साधुसंत ‘हरिबोल’ ‘जय जगन्नाथ’ का उच्चारण करते हुए चल रहे थे। रथयात्रा में चैतन्य महाप्रभु व निताई-निमाई के युगल स्वरूप की झांकी प्रमुख आकर्षण रही।
रथ यात्रा श्रीकृश्ण-जन्मस्थान से आरंभ होकर डीग गेट, मंडी रामदास, चैक बाजार, स्वामीघाट, राजाधिराज बाजार, छत्ता बाजार, तिलक द्वार, कोतवाली मार्ग, भरतपुर दरवाजा व दरेसी मार्ग होकर श्रीकृश्ण-जन्मस्थान प्रांगण में पहुंचकर पूर्ण हुई। लोगों ने रथयात्रा का जगह-जगह स्वागत कर भगवान जगन्नाथ की आरती उतारी। समापन पर आरती के बाद भंडारा प्रसाद का आयोजन हुआ। रथयात्रा में गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी, विनोद बनर्जी, अनुराग पाठक, नारायण राय, भगवान स्वरूप वर्मा, विजय बहादुर सिंह, महापौर विनोद अग्रवाल, मुकेश खंडेलवाल, सोहनलाल, ब्रज किशोर शर्मा, श्रीकृष्ण संकीर्तन मंडल के अनिल, अतुल शोरावाला आदि उपस्थित रहे।
15 दिन बाद दिए ठाकुरजी ने दर्शन
मान्यता है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन गर्मी से निजात पाने के लिए अत्यधिक स्नान करने से भगवान बीमार पड़ जाते हैं। इसके बाद ठाकुरजी 15 दिन तक विश्राम करते हैं और स्वास्थ्य लाभ लेते हैं। उनका जड़ी बूटियों से उपचार किया जाता है। इस दौरान भगवान अपने भक्तों को दर्शन नहीं देते हैं। इसके बाद अषाढ़ शुक्ल द्वितीय के दिन भगवान जगन्नाथ स्वस्थ होकर नगर वासियों को दर्शन देने के लिए अपने भाई बलराम व बहन सुभद्रा के साथ रथ में निकलते हैं।