भारतीय जनता पार्टी की स्टार प्रचारक और मथुरा से सांसद हेमा मालिनी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह सिर्फ मथुरा से ही चुनाव लड़ेंगी। मथुरा के अलावा कहीं से नहीं लड़ना चाहतीं। यह बयान उन्होंने एक इंटरव्यू में ऐसे समय दिया है, जब मथुरा सहित देशभर में भाजपा हेमा को फिर से मथुरा से प्रत्याशी बनाएगी या नहीं इसकी चर्चा जोरों पर है। इधर, हेमा के बयान से टिकट के लिए दावेदारी ठोकने वालों के चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि पार्टी हेमामालिनी की इच्छा को तवज्जो देगी।
हेमामालिनी के प्रतिनिधि जनार्दन शर्मा ने बताया कि हाल में सांसद हेमा मालिनी ने एक इंटरव्यू दिया है, जिसमें उन्होंने मथुरा से ही पुनः चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। उन्होंने कहा है कि वह मथुरा में अभी और विकास करना चाहती हैं। यमुना मईया की स्वच्छता पर काम करना चाहती हैं। अयोध्या में एयरपोर्ट बन सकता है तो उनका मत है कि मथुरा में भी बन सकता है और फिर से सांसद बनीं तो इसके लिए पुरजोर कोशिश करेंगी।
हेमामालिनी ने कांग्रेस को लेकर कहा कि उनकी सरकार के समय में भी बेरोजगारी और महंगाई थी। वहीं, रायबरेली से सोनिया के चुनाव लड़ने की बात पर उन्होंने कुछ भी बोलने से मना कर दिया। जातीय समीकरण साधते हुए उन्होंने यह भी कहा कि जाट भाई हमारे हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा करते हुए कहा कि वह हमेशा काशी, अयोध्या और मथुरा के विकास की बात करते हैं।
भाजपा के लिए जातीय समीकरण साधना चुनौती
हेमामालिनी के बयान के बाद राजनीति के जानकार कह रहे हैं कि भाजपा ने हेमा को फिर से चुनाव लड़ाया तो पार्टी के लिए जातीय समीकरण साधना कड़ी चुनौती होगा। इसके पीछे मानना है कि जिले में जाट बिरादरी से दो विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष, हाल में राज्यसभा के लिए नामित चौधरी तेजवीर सिंह हैं।
यहां जाट मतदाता 3.50 लाख के करीब हैं। मगर, वैश्य भी दो लाख के पार हैं, उनके खाते में सिर्फ मेयर हैं। वहीं, ठाकुर मतदाता, जो कि तीन लाख के करीब उनकी बिरादरी से एक विधायक और एक एमएलसी है। वहीं, इतनी ही संख्या में ब्राह्मण मतदाता भी हैं, उनके खाते में सिर्फ एक विधायक है। ऐसे में ब्राह्मण और वैश्य मतदाताओं को साधना सबसे बड़ी चुनौती होगा।