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Mathura News: पिता ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि को तोड़ा, बेटी मोहन की मीरा बनी

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मथुरा। मुगल शासक औरंगजेब द्वारा श्रीकृष्ण जन्मभूमि को तोड़कर उस पर शाही ईदगाह मस्जिद बनाने का विवाद इतिहास की दलीलों के साथ कानून की चौखट पर इंसाफ की गुहार लगा रहा है। उसके अतीत में कई रहस्य छिपे हुए हैं। इन रहस्यों को कई लेखकों ने कलमबद्ध किया था। ऐसा ही एक उल्लेख औरंगजेब की बेटी जैबुनिस्सा का है। जो उस दौर में मोहन की मुस्लिम मीरा के नाम से प्रसिद्ध हुई। वर्णन है कि पिता ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि तोड़ी और बेटी मोहन की ''''मीरा'''' बन गई।
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भगवान श्रीकृष्ण पर पीएचडी कर रहे स्कॉलर एवं श्रीकृष्ण जन्मभूमि से जुड़े दो वादों में पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि लेखक रुचिर गुप्ता की पुस्तक झेबुन्निसा एक बंडखोर शहजादी, गुलराज सिंह बेदी द्वारा लिखित लेटर टू जेबुनिस्सा और मगन लाल एवं जेस्सी डनकन वेस्टब्रॉक द्वारा लिखित पुस्तक द दीवान ऑफ जेब-उन-निसा पुस्तक में उल्लेख है कि औरंगजेब की बेटी जैबुन्निसा को बुंदेला महाराजा छत्रसाल से प्यार हो गया था। औरंगजेब छत्रसाल को दुश्मन मानता था। उसने फटकार लगाकर बेटी को चुप करा दिया। राजा छत्रसाल मस्तानी के पिता थे। इसके बाद जैबुन्निसा का दिल मराठा छत्रपति शिवाजी पर आया।

जैबुन्निसा ने अपनी मोहब्बत का अर्जी शिवाजी महाराज तक भेजी। शिवाजी ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। फिर वे मुशायरों और महफिलों में शिरकत करने लगी। उनकी मुलाकात शायर अकील खां रजी से हुई और वो मुलाकात इश्क में बदल गई। अब लोग इन दोनों के मोहब्बत की बातें भी करने लगे। अकील खां रजी से अपनी बेटी की इस मोहब्बत को औरंगजेब बर्दाश्त नहीं कर पाया। जैबुन्निसा अकील खां को छोड़ने को तैयार नहीं हुई तो 1691 में दिल्ली के सलीमगढ़ किले में औरंगजेब ने बेटी को कैद करवा दिया गया।
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श्रीकृष्ण की भक्ति से पिता के खिलाफ विद्रोह

महेंद्र प्रताप सिंह के अनुसार पुस्तकों में उल्लेख है कि औरंगजेब हिंदुओं से जितनी नफरत करते थे, उतना ही प्रेम जैबुनिस्सा करती थी। वह मंदिर जाती थी और कृष्ण की भक्ति में लीन रहने लगी थी। पिता औरंगजेब बेटी की इस भक्ति को देख और क्रोधित रहने लगा था। तभी उसने सन् 1670 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि को ध्वस्त करा दिया। सन् 1691 में जैबुन्निसा को कैद में डाला गया तो वह अकेली हो गई। उसने कैद में पिता के खिलाफ विद्रोह तेज कर दिया और भगवान श्रीकृष्ण को अपना सबकुछ मान लिया था। वह कृष्ण भक्ति में ऐसी राम गई कि जैबुन्निसा को मुस्लिम मीराबाई कहा जाने लगा। कैद के दौरान जैबुन्निसा ने 5000 से भी ज्यादा गजलें, शेर और रुबाइयां और कविता संकलन ‘दीवान-ए-मख्फी’ लिखी। 20 साल तक कैद में रहने के बाद जैबुन्निसा ने यहीं दम तोड़ दिया।
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