‘क्राउड कंट्रोल’ करने में यूपी पुलिस खरी नहीं उतर रही है। यदि कहीं भारी भीड़ से इनका सामना हो जाए तो हाथ-पांव फूल जाते हैं। भीड़ के आगे पूरी तरह से सरेंडर कर देती है या सीधे गोली से बात करती है। जवाहर बाग में भी ऐसा ही हुआ।
भीड़ को कंट्रोल करने के तमाम संसाधन इस समय फोर्स के पास मौजूद हैं। गैस के गोले हैं। मिर्ची बम हैं। पानी की बौछार करने का उपाय है। लाठीचार्ज भी किया जा सकता है। लेकिन पुलिस इसके लिए तैयार ही नहीं हो पाती है। जबकि ट्रेनिंग के दौरान भीड़ नियंत्रण का अपना एक पूरा चैप्टर होता है। लगता हैै कि पुलिस वाले इसी चैप्टर पर ध्यान नहीं दे पाते हैं।
पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह का कहना है कि भीड़ कंट्रोल करने के लिए पुलिस को लगातार प्रशिक्षण दिलाया जाता है मगर वह उस तरह से कार्रवाई कर नहीं पाती है। ऐसा नहीं है कि गोली से ही भीड़ को कंट्रोल किया जाता है। तमाम व्यवस्थाएं हैं। लाठीचार्ज भी तब किया जाता है जब लगे कि भीड़ पूरी तरह से अनियंत्रित हो रही है।
पूर्व डीजीपी ब्रजलाल का कहना है कि साधन कई हैं। वज्र वाहन, बाडी प्रोटेक्टर, रबर बुलेट हैं। बुलेट प्रूफ गाड़ियां हैं। जब भी अनियंत्रित भीड़ में पुलिस प्रवेश करे तब इन संसाधनों का होना जरूरी है। यह उन्हें तय करना होता है कि कौन सा संसाधन कब प्रयोग किया जाएगा।
फायरिंग भी भीड़ को डराने के लिए की जाती है। गोली पैर में मारी जाती है। हाथ में मारी जाती है। ऐसी जगह गोली मारी जाती है जहां गोली लगने से किसी को कोई अधिक नुकसान न हो। फायरिंग का मतलब भी यह नहीं होता कि सीधे गोली चला दो। पूर्व डीजीपी ने स्वीकार किया कि इस समय पुलिस भीड़ कंट्रोल करने में फेल हो रही है।