महोबा। खटखट-खटखट तेगा बाजे छापर-छापर चले तलवार, बढ़े लड़इया आल्हा-ऊदल जिनसे हार गई तलवार, पारस पथरी गढ़ महुबे में लोहा छुअत सोन हुई जाए की गूंज से बुंदेलों की भुजाएं फड़क उठीं। कजली मेले के पहले दिन आल्हा मंच में गायकों ने वीर रस से ओतप्रोत आल्हा गायन पेश किया।
आल्हा मंच में पहले दिन आल्हा सम्राट वंशगोपाल यादव ने भुजरियों की लड़ाई का वर्णन किया। कहा कि 1182 में दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान ने महोबा में चढ़ाई कर दी थी। तब ऊदल ने कहा था कि जितनी सेना है दिल्लीपथ की मौरे लड़े भरे खां नाएं, तब पिछली सेना पृथ्वीराज की सावन हो गया महोबा क्यार की पक्तियां वीर रस में सुनाईं।
मेले में उमड़ा अपार जनसैलाब
मेले में महोबा के अलावा हमीरपुर, बांदा, चित्रकूट, झांसी, ललितपुर, मऊरानीपुर, राठ, मध्यप्रदेश के छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़, दमोह, सतना, रीवा से सैकड़ों की संख्या में मेला प्रेमी आए।