कथा का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि अधर्मियों को मिटाने और साधु संतों की रक्षा करने के लिए भगवान स्वयं प्रकट होते हैं। भगवान श्रीराम ने अपने चौदह साल के वनवास के दौरान ताड़का, मेघनाद, कुंभकरण जैसे राक्षसों का संहार कर साधु संताें की रक्षा की। उन्हाेंने कहा कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए पूजा पाठ के दिखावे की आवश्यकता नहीं होती है। भगवान केवल भाव के भूखे होते हैं। जब भक्त अपने भगवान को सच्चे दिल से याद करते हैं तो वे बरबस ही खिंचे चले आते हैं। उन्होंने कहा कि सबरी द्वारा भगवान को याद किए जाने पर उन्हाेंने उसकी कुटिया में जाकर जूठे बेर खाने में भी संकोच नहीं किया था। रामकथा के अंतिम दिन श्रद्धालुआें ने यज्ञ कुंड में पूर्णाहुति देकर सुख समृद्धि की कामना की। इस मौके पर नरसिंह कुटी के महंत विशंभर दास, कैलाश नारायण द्विवेदी, प्रमोद मिश्रा, आचार्य पुष्पराज महाराज, अखिलेश, आशीष द्विवेदी, आशीष त्रिपाठी सहित तमाम श्रद्धालु मौजूद रहे।