घुघली। शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले। वतन पर मरने वालों का बस यहीं बाकी निशा होगा। घुघली के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास भी बड़ा संघर्ष पूर्ण रहा है। राष्ट्रपिता के घुघली आने की सूचना भर से लोगों के सीने में देश को आजाद कराने की चिंगारी धधक उठी थी।
महात्मा गांधी चार अक्तूबर 1929 को छुकछुक करती रेलगाड़ी से घुघली पहुंचे थे। वहां रात को मुंशी छत्रधारी लाल के आवास पर विश्राम करने के बाद पांच अक्तूबर को वह बैकुंठी घाट पर पहुंचे। बैकुंठी घाट से लोगों को संबोधित किया, जिसमें कई गांव के लगभग डेढ़ हजार लोग इक्कठा हुए थे। उनके ओजस्वी भाषण को सुन चौमुखा, बासपार व विशुनपुर गबडुवा गांव के लोगों में देश भक्ति की चिंगारी धककने लगी।
सात अप्रैल 1930 को महात्मा गांधी के गोरखपुर आगमन पर प्रोफेसर सिब्बन लाल सक्सेना ने उनके प्रति आस्था जताते हुए उनके पद चिह्नों पर चलने का संकल्प लिया था। 28 अगस्त 2031 को काशी में महात्मा गांधी की सभा चल रही थी। उन्हें यह संदेश मिला कि महराजगंज में एक जमीदार ने राजबली को आग में झोकवा दिया है। इस संदेश ने महात्मा गांधी को अंदर से मर्माहत कर दिया। उनके निर्देश पर महराजगंज की कमान प्रोफेसर सक्सेना को सौंपी गई। प्रो. सिब्वन लाल सक्सेना ने बिशुनपुर गबडुवा गांव के निवासी काशीनाथ को तहसील स्तर का मंत्री बनाया।
काशीनाथ ने गांव में टोली बनाई, जो आसपास के गावों में छुपे रूप से लोगों से मिलकर अंग्रेजों को भगाने और विदेशी वस्तुओं का त्याग करने की मुहिम चलाने लगे। टोली के सदस्य सुदामा प्रसाद, बद्री, महादेव, बनवारी, ट्पेसर, सुखराज, झिनकू, जनकराज, तिलकधारी, रामधारी, शिवदत्त, सरजू, हरिबंश, रामजतन, त्रिलोकी व रामदेव ने काफी उत्साहित ढंग से अपने संकल्प को निभाया। जान की बाजी लगाकर देश की आजादी की लड़ाई में लगे रहे।
दो ने सीने पर खाई थी गोलियां, दर्जन भर रहे थे जेल में
घुघली। देश की आजादी की लड़ाई में बिशुनपुर गबडुवा व आसपास के गांव के लोगों ने भी बड़ा योगदान दिया था। इनकी याद में बिशुनपुर गबडुवा में शहीद स्मारक बना है। आज भी पूरा जिला यहां पर हर साल 26 जनवरी 15 अगस्त को शीश नवाता है। प्रत्येक वर्ष मेला का आयोजन होता है।
26 अगस्त 1942 को प्रो. सक्सेना गबडुवा में बैठक करने वाले थे। बगल के गांव के ब्रिटिश हुकूमत के हमदर्द एक रईस ने बिशुनपुर गबडुवा के गांव की इस योजना की जानकारी मास कलेक्टर गोरखपुर को दी। 27 अक्तूबर 1942 को तड़के ब्रिटिश हुकूमत के सिपाहियों सहित हमदर्द रईस के कुछ लोगों ने गांव की नाकेबंदी करा दी। गांव के सुखराज व झिनकू ने घर से निकलकर ब्रिटिश हुकूमत के सिपाहियों सहित रईस को ललकारा व गांव छोड़कर भागने की आवाज बुलंद की। झल्लाए सिपाहियों ने दोनों क्रांतिकारियों को गोलियों से भून दिया। गांव में छिपे जानकराज, तिलकधारी, रामधारी, शिवदत्त, सरजू, हरिवंश, रामजतन, त्रिलोकी व रामदेव आदि सिपाहियों के हत्थे लग गए। सिपाहियों ने इनकी खूब पिटाई की तथा हवालात में डाल दिया।