महराजगंज। जिले में अधोमानक दवाएं धड़ल्ले से बिक रही हैं। विभाग इन पर अंकुश नहीं लगा पा रहा है। उत्तराखंड, दिल्ली से दवा मंगाकर मोटा मुनाफा कमाया जा रहा है। वहीं मरीजों की जेब ढीली होने के साथ ही बीमारी भी जल्दी ठीक नहीं होती है। क्योंकि दवाओं में जिन तत्वों की जरूरत होती है वह बहुत ही कम मात्रा में होती है, इस वजह से दवाएं जल्दी काम नहीं करती हैं।
नकली और अधोमानक दवाओं का धंधा आजकल फिजीशियन सैंपल की दवाओं के रूप में चल रहा है। सूत्रों की माने तो मेरठ, आगरा, दिल्ली व कानपुर से बड़े स्तर पर ऐसी दवाओं की सप्लाई की जा रही है। दवा बाजार में सब स्टैंडर्ड या अधोमानक दवाओं का खेल काफी गहरे तक जड़ जमा चुकी हैं। बिहार व नेपाल बाॅर्डर के छोटे-छोटे कस्बों और बाजारों में बड़े ब्रांड की दवाओं वाले नाम पर ही दवाएं बिक रही हैं। ऐसे मामलों में बड़ी कार्रवाई कम ही होती हैं, लिहाजा यह धंधा तेजी से फल-फूल रहा है। दवा विक्रेता कम रेट में इन मिलते-जुलते नाम वाली दवाओं को खरीदकर ब्रांडेड के दाम पर ही बेच देते हैं।
दवा कारोबार से जुड़े संजीव ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्र में छोटे-छोटे मेडिकल स्टोर संचालक ही आसपास के लोगों के लिए डॉक्टर की भूमिका में भी होते हैं। वे सर्दी-जुकाम, एसिडिटी, दर्द आदि की दवाएं खुद ही मरीज को लक्षण पूछकर दे देते हैं। वे ही ऐसी दवाओं की बिक्री के सबसे बड़े माध्यम भी बनते हैं, क्योंकि वे मरीजों को फुटकर में दवा देते हैं। दवा देते हुए पत्ते को इस तरह से काटते हैं कि उसका नाम बड़े ब्रांड जैसा प्रतीत हो। एक दवा कारोबारी ने बताया कि अधोमानक दवा के खेल में रेट का अंतर बहुत होता है। 40 रुपये पत्ते की दवा पर रेट 100 से 150 रुपये अंकित रहता है। इसमें मोटा मुनाफा होता है। इसी तरह से अन्य दवाओं में रेट का काफी अंतर होता है।
मेडिकल स्टोरों पर दवाइयों की जांच के लिए औषधि प्रशासन विभाग निरीक्षण करता रहता है। यही नहीं पूर्व में कई बार मेडिकल स्टोरों से नशीली दवाइयां भी बरामद की चुकी हैं। अब कुछ मेडिकल स्टोर स्वामियों ने अच्छा मुनाफा कमाने के लिए 15 से 25 प्रतिशत छूट भी देते हैं।