महराजगंज। खेतों से फसल की कटाई होते ही डंठलों में आग लगा देने के कारण हरी घास का अकाल सा हो गया है, जिसके चलते पशुओं का स्वास्थ्य गिरने लगा है। पशु पालक पहले पशुओं को खेतों अथवा जंगल में छोड़ देते थे, जो चारे की तलाश में घूम कर पेट भरते थे। खेतों में डंठल जलाने और जंगलों में आग लगने से मेड़ों पर सूखी घास से पशु अपनी भूख मिटा रहे हैं। गर्मी व बढ़ते तापमान के बीच चारे का संकट गहरा गया है।
गेहूं की फसल कटने पर सूखे पड़े खेत जली डंठलों के राख के साथ उड़ रही धूल के बीच भूखे पशु खेत में खड़े डंठल व मेड़ पर खड़ी बची सूखी घासों के सहारे हैं। पशुपालक नयनसर के रामसुभग ने बताया कि गर्मी के मौसम में बाजरा, बरसीन हरे चारे का साधन है, लेकिन निजी साधन से सिंचाई महंगा पड़ता है। इसलिए पशुओं को खेतों में चरने के लिए छोड़ देते हैं। शाम को घर में भूसा और खली आटा देते हैं। अंगद चौधरी ने कहा कि डंठल जलाने से चारे का संकट बढ़ गया है।
किसान पशुओं को भूसा तो खिला देते हैं, लेकिन उसमें हरा चारा नहीं मिला पा रहे हैं। गड्ढ़े, तालाब के सूख जाने, पानी न आने की वजह से पशुओं को पानी की भी समस्या हो रही है। जिससे पशुओं में जहां दूध की मात्रा गिर रही है, वहीं पशुओं का स्वास्थ्य भी खराब हो रहा है। तेज धूप से बचने के लिए पशु पेड़ छाया का सहारा ले रहे हैं। डंठलों को जला देने के कारण भूसा भी 500-700 रुपये क्विंटल में बिक रहा है।
खेतों से फसल काटने के बाद अवशेष जलाने के कारण हरा चारा नमी न मिलने के कारण गर्मी में कम उगता है। हरा चारा न मिलने से पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता पर असर पड़ सकता है। पशु पालक इससे बचने के लिए अपने खेतों में हरा चारा जरूर लगाएं।
-उदयनाथ सिंह, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी