कभी प्यार, कभी डांट से गुरु ने दिखाई सफलता की राह
शिक्षक दिवस पर गुरुजनों ने किया अपने गुरुओं को याद
महराजगंज। अक्षर-अक्षर हमें सिखाते, शब्द-शब्द का अर्थ बताते, कभी प्यार-कभी डांट से हमें जीवन जीना सिखाते गुरु के वचन आज भी जेहन में हैं। प्रश्न का जवाब गलत होने पर उन्होंने डांटा, लेकिन स्नेहपूवर्क तथ्यपरक ढंग से समझाते हुए मुश्किल आसान कर दी। समय के सदुपयोग करने का तरीका सीखकर आगे बढ़ा तो सफलता की राह आसान हो गई। ये बातें जवाहर लाल नेहरू पीजी कॉलेज महराजगंज के पूर्व प्राचार्य डॉ. महेश मणि त्रिपाठी ने शिक्षक दिवस पर अपने गुरु को याद करते हुए कहीं।
डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि बात 1988 की है। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर में हिंदी की विभागाध्यक्ष प्रोफेसर गिरीश रस्तोगी के सानिध्य में पीएचडी की। बताया कि प्रोफेसर गिरीश रस्तोगी का हिंदी साहित्य के इतिहास में बड़ा नाम है। उन्होंने रूपांतर नाट्य कला मंच नामक एक संस्था बनाई और इससे छात्राओं और छात्रों को जोड़कर देश-विदेश के साहित्यिक मंच पर लगभग 300 प्रस्तुतीकरण दिए। प्रोफेसर रस्तोगी सदैव अपने जीवन के संघर्षों से छात्रों को प्रेरित करती थीं। अनुशासन को वह काफी महत्व देती थीं। थोड़ा भी अंतर होने पर डांटती थीं, परंतु उनके डांट में भी प्यार होता था।
इतिहासकार डॉ. आरके मिश्र ने बताया कि उनके गुरु प्रोफेसर जीआर शर्मा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास के विभागाध्यक्ष रहे। उनके मार्ग दर्शन एवं प्रेरणा से जीवन में सफलता मिली। वह अपनी नाराजगी को हंस कर बयां कर देते थे। प्रोफेसर शर्मा हंसमुख स्वभाव के हैं। उनके इसी स्वभाव के कारण छात्र उनके बेहद करीब रहते थे। प्रोफेसर जीआर शर्मा को प्राचीन स्थल कौशांबी की खोज और उत्खनन का श्रेय प्राप्त है। वह राज्यपाल के सांस्कृतिक सलाहकार भी रह चुके हैं। विश्व के ऐतिहासिक मंच पर कौशांबी की खोज का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है।
जवाहर लाल नेहरू पीजी कॉलेज महराजगंज के प्राचार्य प्रोफेसर दिग्विजय नाथ पांडेय ने शिक्षक दिवस पर अपने गुरु प्रोफेसर रामकृष्ण मणि त्रिपाठी से मिली सीख साझा की। कहा कि उनके गुरु दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे। उन्होंने लक्ष्य के प्रति सजग रहने का मंत्र दिया, जिसे आत्मसात कर आगे बढ़ा तो आज इस मुकाम हूं। वह हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और संस्कृत के प्रकांड विद्वान माने जाते हैं। संवाद
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गुरु की मुस्कुराहट में छिपा होता था माफ करने का राज
महराजगंज। गुरु की मुस्कुराहट में शिष्य को माफ करने का राज छिपा रहता था। जब कभी उनके पूछे प्रश्नों का सटीक जवाब नहीं मिलता था, तो नाराज होते थे, लेकिन मेरी तरफ देखते ही मुस्कुरा देते थे। मैं समझ जाता था कि अब गुरु जी नाराज नहीं है, तब मन को तसल्ली मिलती थी। यह कहते हुए पूर्व विभागाध्यक्ष राजनीति विज्ञान प्रोफेसर इनामुल्लाह सिद्धिकी अपने गुरु प्रोफेसर रधुबीर के व्यक्तित्व का बखान करने लगे। कहा कि वर्ष 1975 की बात है, जब मैं गोरखपुर विश्वविद्यालय में शोध कर था। उस वक्त मेरे गुरु प्रोफेसर रघुबीर सिंह सभी शिष्यों से सख्ती बरतते थे। उन दिनों गुरु-शिष्य के बीच का संबंध बहुत की अलग तरह का होता था। उनका मुख्य स्लोगन पढ़ो और आगे बढ़ो, को जीवन का आधार बनाकर आगे बढ़ा तो कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
डॉ. महेश मणि त्रिपाठी, पूर्व प्राचार्य, जवाहरलाल नेहरू पीजी कॉलेज महराजगंज। संवाद- फोटो : MAHARAJGANJ