महराजगंज। भारत-नेपाल सीमा से तस्करी पर अंकुश लगाने के एसएसबी के दावे और वादे के बीच तस्करों का खेल बदस्तूर जारी है। तस्करों नए-नए तरीके अपनाकर जवानों को लगातार मात दे रहे हैं। इन दिनों उन्होंने सीमावर्ती क्षेत्रों में नन्हे जासूसों की फौज तैनात कर रखी है, जो बार्डर पर होने वाली हर गतिविधि की सूचना उन तक पहुंचाते हैं। ये नन्हे जासूस हाथ में मोबाइल लिए दिनभर सीमा क्षेत्र में धमाचौकड़ी मचाते रहते हैं। जैसे ही जवानों का गश्ती दल वहां से गुजरता है, ये नन्हे जासूस तस्करों तक सूचना पहुंचा देते हैं। दरअसल, जवानों को देखते ही नन्हे जासूस कहते हैं- सर प्रणाम। बच्चों के अभिवादन से एसएसबी के जवान खुश हो जाते हैं। वे मुस्कुरा कर स्नेह भरी नजरों से बच्चों को देखते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। जवानों को यह आभास भी नहीं होता कि प्रणाम उन्हें नहीं किया गया है, बल्कि यह कोर्ड वर्ड है जो तस्करों को सतर्क कर देता है।
जानकारी के मुताबिक, तस्करों की दुनिया में नन्हे जासूसों की टीम को लाइनर नेटवर्क के नाम से जाना जाता है। इन्हें सीमावर्ती क्षेत्र में अवैध शराब के धंधेबाजों की मदद के लिए तैनात किया जाता है। नेपाली शराब की कीमत कम होने की वजह से इन दिनों इसकी तस्करी जोरों पर है। भारतीय सीमा से लगते नेपाल को गांवों और गलियों पर जाएं तो शराब की तमाम दुकानें दिख जाएंगी। काफी संख्या में भारतीय यहां अपना गला तर करने पहुंचते हैं। भारतीय क्षेत्र में नेपाली शराब की काफी मांग है। इसका लाभ उठाने के लिए धंधेबाज तस्करी का सहारा लेते हैं। वे कैरियरों की मदद से नेपाली शराब भारतीय क्षेत्र में पहुंचा देते हैं। भारत पहुंचते ही इसकी कीमत बढ़ जाती है, जिसे चोरी छिपे बेचकर धंधेबाज मोटी मुनाफा कमाते हैं।
तस्करों को अलर्ट करने का नायाब तरीका
- इंडो-नेपाल बॉर्डर एरिया में इन दिनों दो-चार की संख्या में बच्चे टहलते तो कभी कोई खेल खेलते मिल जाएंगे। तलाश करें तो इनकी जेब में मोबाइल जरूर मिलेगा। दरअसल, ये बच्चे यहां मनोरंजन नहीं कर रहे होते हैं, बल्कि उनका मकसद एसएसबी के जवानों की निगरानी करना होता है। जवानों के आते ही वे चिल्लाते हैं- सर प्रणाम। इस कोर्ड वर्ड को सुनते ही तस्कर सतर्क हो जाते हैं। ऐसा नजारा लक्ष्मीपुर खुर्द, मटरा धमउर से लेकर कनमिसवा बॉर्डर के इलाके तक देखने को मिलता है।
बच्चों को मिली है लाइनर की ट्रेनिंग, जासूसी के एवज में मिलता है पैसा
सूत्रों की माने तो बॉर्डर एरिया में लाइनर नेटवर्क के तौर पर काम करने वाले बच्चों को तस्कर पहले ट्रेनिंग देते हैं। फिर उन्हें काम पर लगाया जाता है। इससे पहले तस्कर उन्हें मोबाइल फोन और सिम मुहैया कराते हैं। ताकि वे सीमा की हर गतिविधि की सूचना उन तक पहुंचा सकें। जवानों की जासूसी के एवज में तस्कर बच्चों को तय रकम देते हैं।
भारत के सीमावर्ती बाजारों में आसानी से मिल जाती है नेपाली शराब
निचलौल का गेड़हवा गांव जिला और भारतीय सीमा का अंतिम गांव है। गांव के पूरब जंगल और नारायणी नदी है। नदी उस पार नेपाल के सुस्ता और सोहगीबरवा का घना जंगल है। उसके बाद बिहार है। यहां से लोग नाव से नदी के रास्ते भारत से नेपाल आते-जाते रहते हैं। यह इलाका पथलहवा बीओपी के एसएसबी चेक पोस्ट की निगरानी क्षेत्र में आता है। चेकिंग के नाम पर जवान बस झोले की तलाशी लेते हैं और कार-बाइक की डिक्की चेक करते हैं। बॉर्डर से कुछ दूरी पर बहुआर, रेंगहिया, ठूठीबारी बाजार हैं। यहां नेपाली शराब और नशीली दवाएं खुलेआम मिल जाती हैं, जो तस्करी के जरिए यहां पहुंचती है। तस्करों ने यहां सीमा पार करने के अनेकों रास्ते बना लिए हैं। सीमा से सटे इलाके में बसे किसानों की जमीन एक-दूसरे देश में है। यही तस्करों के लिए सीमा पार करने के लिए कवच का काम करता है। इन इलाकों के अलावा बरगदवा, ठूठीबारी, लक्ष्मीपुर, रेंगहिया, मटरा धमउर, झुलनीपुर, बहुआर, गेड़हवा में भी नेपाली शराब आसानी से मिल जाती है।