महराजगंज/सिसवा बाजार। नगर में स्थित ऋषिकुल संस्कृत महाविद्यालय का अतीत जितना गौरवशाली था, अब उसका वर्तमान उतना ही बदहाल है। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान इस महाविद्यालय में संस्कृत, व्याकरण, ज्योतिष, साहित्य व वेद पुराण की शिक्षा के लिए दूर-दराज से छात्र पढ़ने आते थे, लेकिन बाद में बदहाल शिक्षा नीति व विभागीय उपेक्षा का ग्रहण इस महाविद्यालय को इस कदर लगा कि अब यहां आचार्य के नाम पर महज एक मानदेय शिक्षक की तैनाती है।
बस्ती जनपद के मनिकापुर क्षेत्र के ग्रामसभा सहजनपुर निवासी रामछत्र द्विवेदी ने 1922 में सिसवा में ऋषिकुल संस्कृत महाविद्यालय का स्थापना कराया था। संपूर्णानंद विश्वविद्यालय वाराणसी से संचालित इस संस्कृत महाविद्यालय का गौरवशाली अतीत रहा है। महाविद्यालय के दस्तावेज ही इसकी गवाही देते हैं। 60 व 70 के दशक में यहां की संस्कृत की शिक्षा व सभ्यता व संस्कृति देश के कोने-कोने तक पहुंची। पूर्वांचल के अलावा बिहार व पड़ोसी मुल्क नेपाल के विद्यार्थी इस महाविद्यालय में प्रथमा से लेकर आचार्य तक की पढ़ाई के लिए आते थे छात्रों को बैठने की जगह भी नहीं मिलती थी और वो विद्यार्थी व्याकरण, ज्योतिष, साहित्य व पुराण की शिक्षा में पारंगत होकर निकलते थे। आज महाविद्यालय की हालत इतनी दयनीय है कि न तो किसी कक्ष का दरवाजा बचा है, न खिड़की और हर कमरे में गंदगी का अंबार लगा है। दीवारें पान और गुटके के पीक से रंगे हुए हैं। अब ये विद्यालय कुछ मनबढ़ों के लिए जुआ और नशा करने के काम में आता है।