ताल पर पर्यटन सुविधा को बढ़ावा दिए जाने की पहल सिर्फ फाइलों में सिमट कर रह गई
संवाद न्यूज एजेंसी
महराजगंज। दर्जीनिया ताल पर पर्यटन सुविधा बेहतर नहीं है। हैंडपंप खराब है। बैठने के लिए लगे बेंच टूट चुके हैं। ताल में जलकुंभी ज्यादा होने के कारण मगरमच्छ भी टीले पर कम दिखते हैं। ताल पर पर्यटन सुविधा को बढ़ावा दिए जाने की पहल सिर्फ फाइलों में सिमट कर रह गई है।
जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर नारायणी नदी के किनारे मुसहर बस्ती गेड़हवा के पास दर्जीनिया ताल को मगरमच्छों का घर कहा जाता है। ताल में निर्मित टीलों पर अपने बच्चों के साथ खेलते व झुंडों में मगरमच्छ लुभावने होते हैं, लेकिन बदहाल व्यवस्था के कारण मगरमच्छ कम दिखते हैं।
जानकारी के अनुसार, मनोरम वादियों के बीच दर्जीनिया ताल करीब पांच हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यह मगरमच्छों के लिए अनुकूल आबोहवा है। यही कारण है कि ताल में मगरमच्छों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। अब ताल में मगरमच्छों की संख्या करीब पांच सौ पहुंच चुकी है। पिछले एक वर्ष में करीब 75 हजार पर्यटकों ने दर्जीनिया ताल पहुंचकर मगरमच्छों को देखकर लुत्फ उठाया है।
महेशपुर के वीरू थापा ने बताया कि दर्जीनिया ताल पर बेहतर सुविधा नहीं है। बेवजह शुल्क वसूला जा रहा है। पेयजल की सुविधा नहीं है। बेंच भी टूट गए हैं। झुलनीपुर के नरेश ने बताया कि सुविधा नहीं है।
बगैर सुविधा के दर्जीनिया ताल पर लग रहा शुल्क
वन विभाग पर्यटकों के लिए दर्जीनिया ताल पर सुविधाएं भले ही मुहैया नहीं करा पा रहा हो लेकिन पर्यटकों से शुल्क की वसूली करना नहीं भूला है। ताल पर पहुंचने के लिए पूर्वी गेट पर बैरियर लगाकर तैनात वनकर्मी विजय बहादुर ने बताया कि ताल पर पहुंचने के लिए प्रति बाइक 50 रुपये, चार पहिया वाहन के लिए 150 रुपये और प्रति व्यक्ति 20 रुपये शुल्क लग रहा है।
योजना धरातल पर नहीं दिख रही
पर्यटकों की संख्या को देख शासन की ओर से दर्जीनिया में 80 लाख की लागत से करीब 50 डिस्मिल जमीन पर पूर्वांचल का पहला बटरफ्लाई पार्क बनाने की योजना धरातल पर नहीं दिख रही है। करीब 70 मीटर इंटरलॉकिंग सड़क, पार्क में एंट्री गेट, ओक ट्री सहित अनेक प्रजाति के पौधे लगाने योजना थी।
कोट
वन विभाग के प्रस्ताव पर शासन ने बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत दर्जीनिया ताल में वाटर एटीएम लगाने के लिए वित्तीय मंजूरी मिली है। वन विभाग ने 60 लाख रुपये की कार्ययोजना बनाकर शासन को भेजी थी। इसमें से 15.22 लाख की वित्तीय स्वीकृति मिली है।
-सुनील राव, वन क्षेत्राधिकारी, निचलौल