स्वतंत्रता संग्राम में सिसवा के रणबांकुरों ने भी अपनी अहम भूमिका निभाई थी। आजादी के जंग में सिसवा क्षेत्र के खेसरारी गांव का गौरवशाली इतिहास रहा है। इसका जीता जागता उदाहरण है ग्राम सभा सिसवा बुजुर्ग में स्थित सेनानियों की याद में बना स्मारक स्तंभ। यह वीर सेनानियों की गाथा का प्रतीक है। वर्ष 1930 में इन सेनानियों ने ब्रिटिश हुकूमत द्वारा वसूले जा रहे लगान का जमकर विरोध किया। इस पर इन स्वतंत्रता सेनानियों से नाराज अंग्रेजों ने खेसरारी गांव को लूट लिया था।
स्वतंत्रता संग्राम में अपना सब कुछ न्योछावर करने वाले प्रोफेसर शिब्बनलाल सक्सेना के नेतृत्व में सिसवा क्षेत्र के सुंदर सिंह, विश्वनाथ सिंह, मदन पांडेय, दामोदर शर्मा, तिलक चौधरी, पारसनाथ पांडेय, रामप्रसाद भालोटिया, मातादीन मद्धेशिया, बृजभूषण लोनिया, रामदयाल, रामबली भगत, सुदामा प्रसाद, और कपिलदेव ने अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध मोर्चा खोल रखा था।
वर्ष 1930 में इन सेनानियों ने ब्रिटिश हुकूमत द्वारा वसूले जा रहे लगान का जमकर विरोध किया। इस पर इन स्वतंत्रता सेनानियों से नाराज अंग्रेजों ने सिसवा के सीमावर्ती गांव खेसरारी पर धावा बोल दिया। देखते ही देखते अंग्रेजों ने पूरे गांव को लूट लिया।
इस दौरान सेनानियों ने जमकर संघर्ष किया। घायलावस्था में भी इन सेनानियों ने हिम्मत नहीं हारी और प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना के नेतृत्व में सेनानियों ने इसकी खबर महात्मा गांधी तक पहुंचा दिया। गांधी जी ने इस घटना को 1931 में इंग्लैंड में आयोजित गोलमेज कांन्फ्रेन्स में उठाया। परिणाम स्वरूप बाबा राघवदास की देखरेख में पांच सदस्यीय टीम का गठन किया गया। इस टीम ने लूटे गए सामानों को पुन: खेसरारी गांव में जाकर ग्रामीणों में वापस कराया।
सिसवा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के पूर्व प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. सुमित महाराज ने 15 अगस्त व 26 जनवरी के सायं को स्तंभ कैंडिल जला कर शहीदों को नमन करने की परंपरा शुरू की थी जो अभी तक जारी है। जून 2017 में ‘पहल’ नामक संस्था ने इस स्तंभ का जीर्णोद्धार कराकर इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने का कार्य किया है।