जिला अस्पताल में बच्चे की जांच करते डॉक्टर।
महराजगंज। बच्चे की नाक बहती है, खांसी-जुकाम बार-बार होता है। सांस लेने में तकलीफ या सीने से घर्र-घर्र की आवाज आती है तो ये अस्थमा के लक्षण हैं। इसे नजरअंदाज न करें, डॉक्टर को दिखाकर जांच करा लें। जिला अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ की ओपीडी में इन दिनों 10-12 फीसदी बच्चों में अस्थमा मिल रहा है। शुरुआती में लक्षण दिखने पर इलाज से ये मर्ज काफी हद तक ठीक हो सकता है। अगर इलाज में देरी की हुई तो बच्चा गंभीर रूप से बीमार पड़ सकता है। उसे अस्थमा का अटैक भी आ सकता है।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विशाल चौधरी ने बताया कि ओपीडी में करीब 10 फीसदी बच्चे इस समस्या से पीड़ित आ रहे हैं। अस्थमा अनुवांशिक बीमारी होती है। बच्चों में इसके लक्षण दो साल से मिलने शुरू हो जाते हैं। कुछ में ये बीमारी किशोरावस्था के दौरान सामने आती है। उन्होंने बताया कि अगर बच्चे को 10 दिन तक खांसी-जुकाम रहता है और दवा खिलाने के बाद भी ठीक नहीं होता है तो अस्थमा की जांच जरूर कराएं।
इलाज न कराने पर बच्चे को आगे चलकर अस्थमा का अटैक पड़ना शुरू हो सकता है। समय पर इलाज नहीं किया तो बीमारी लाइलाज हो जाती है। उन्होंने बताया कि ओपीडी में हर महीने 200 से 250 अस्थमा के नए मरीज दिखाने के लिए आते हैं। अस्थमा के इलाज में दवाओं से ज्यादा कारगर इन्हेलर होता है। इन्हेलर को लेकर लोगों में भ्रम रहता है कि इसका उपयोग करने से आदत पड़ जाती है।
बच्चों में अस्थमा के लक्षण
-बच्चे को मुख्यतौर पर रात में खांसी होना
-सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज आना
-बच्चे की छाती में जकड़न होना
-जल्दी थकना और कमजोरी महसूस होना