मनोचिकित्सक बोले- मोबाइल गेम में ज्यादा व्यस्त रहने के कारण ड्रीम वर्क से ग्रसित हो रहे बच्चे, सचेत रहें अभिभावक
संवाद न्यूज एजेंसी
महराजगंज। शहर में 14 वर्ष के एक के किशोर को एफपीएस कमांडो सीक्रेट घरों मिशन गेम खेलने की लत ऐसी लगी कि वह अब नींद में ऐसे-ऐसे शब्द बोलता है कि माता-पिता घबराए हुए हैं। नींद में वह धांय धांय या आई बिल किल यू मार डालो जैसे शब्द बोलता है। ऐसी आवाजें सुनते ही माता-पिता उसे नींद से जगा देते हैं। तब जाकर वह सामान्य होता है, लेकिन यह समस्या एक दिन की नहीं है।
सप्ताह में चार-पांच दिन इसी तरह नींद में बड़बड़ाना सामान्य हो गया है। ऐसे मामले कोरोना महामारी के बाद तेजी से बड़े हैं। महामारी के दौरान बच्चों के हाथों में लैपटॉप और मोबाइल फोन पकड़ा दिया गया। उन पर नजर भी नहीं रखी गई। ऐसे में बच्चों को गेम की लत लग गई। इसमें ज्यादातर गेम हिंसक हैं। ये उनके दिमाग पर अलग-अलग तरीके से असर कर रहे हैं। बच्चे नींद में बड़बड़ा रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, केएमसी डिजिटल अस्पताल के मनोरोग अनुभाग में आठ से 10 बच्चों की काउंसिलिंग मनोचिकित्सक कर रहे हैं। मनोचिकित्सकों का कहना है कि किसी भी चीज की लत दिमाग पर हावी हो जा, तो उसे मनोचिकित्सक की भाषा में ड्रीम वर्क कहते हैं। यह ड्रीम वर्क दिमाग में इस कदर बैठ जाता है कि बच्चा हर वक्त उन्हीं बातों को सोचता है। मनोचिकित्सक डॉ. आनंद मुर्गन ने बताया कि गेम की लत बच्चों के दिमाग पर हावी होती जा रही है, जो उनके भविष्य के लिए ठीक नहीं है।
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अकेलापन प्रमुख कारण बन रहा
डॉ. आनंद मुर्गन ने बताया कि इस तरह के मामलों में प्रमुख कारण अकेलापन होता है। बच्चों ने खुद बताया कि मम्मी-पापा घर में नहीं रहते हैं। कोई बुजुर्ग भी नहीं हैं, जो उनसे बात करें। सवालों का जवाब दे। यही कारण है कि बच्चों का ज्यादा वक्त मोबाइल फोन पर गुजर रहा है। अभिभावकों की काउंसिलिंग की जा रही है कि वे बच्चों को ज्यादा वक्त दें। उनसे बातचीत करें। उनके साथ घूमने-टहने जाएं। इस वजह से बच्चे व्यस्त रहेंगे तो मोबाइल फोन पर ज्यादा वक्त नहीं गुजारेंगे।
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गेम की लत से बच्चों की सेहत भी हो रही प्रभावित
केएमसी डिजिटल अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. आनंद मुर्गन ने बताया कि गेम की लत से बच्चों की सेहत भी प्रभावित हो रही है। वे डिप्रेशन और एंजाइटी का शिकार हो रहे हैं। ऐसे बच्चों की काउंसिलिंग की जा रही है। अभी केवल तीन से चार फीसदी बच्चों को दवा की जरूरत पड़ रही है। माता-पिता को भी समझाया जा रहा है कि बच्चों को मोबाइल फोन से दूर रखें। लेकिन अचानक नहीं, धीरे-धीरे एक नियम बनाएं और उन्हें मोबाइल फोन के इस्तेमाल से रोकने की जरूरत है।
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यह समस्या जल्द समाप्त नहीं होने वाली
ऐसे मामले कोरोना महामारी के बाद तेजी से बढ़े हैं। महामारी के दौरान बच्चों के हाथों में लैपटॉप और मोबाइल फोन पकड़ा दिया गया। उन पर नजर भी नहीं रखी गई। ऐसे में बच्चों को गेम की लत लग गई। इसमें ज्यादातर गेम हिंसक हैं। ये गेम उनके दिमाग पर अलग-अलग तरीके से असर कर रहे हैं। बच्चे नींद में बड़बड़ा रहे है। डॉ. आनंद मुर्गन का कहना है कि यह समस्या जल्दी समाप्त नहीं होने वाली है। क्योंकि, बच्चों का दिमाग ज्यादा तेज चलता है। एक बार अगर दिमाग में कोई बात बैठ जाती है तो वह हर वक्त गूंजती रहती है। इसी समस्या को ड्रीम वर्क कहते हैं।
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रुक जाता है हैपी होर्मोंस का रिसाव
डॉक्टरों के अनुसार, ऑनलाइन गेम या अन्य मनोरंजक साधनों के इस्तेमाल से बच्चों के मस्तिष्क में न्यूरो केमिकल का रिसाव होता है जिसे हैपी हार्मोंस कहते हैं। इस बीच अचानक उसे गेम खेलने से रोक दिया जाए तो हैप्पी हार्मोस का रिसाव रुक जाता है। इसकी वजह से बच्चे डिप्रेशन में आने लगते हैं। ऐसे बच्चों को काउंसिलिंग और दवाओं की जरूरत पड़ रही है।
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90 फीसदी बच्चे खेलते हैं गेम
चाइनीज गेम पब-जी के बैन होने के बाद भी कई ऐसे गेम है, जो बच्चों के दिमाग पर ज्यादा असर डाल रहे हैं। इनमें एफपीएस कमांडो सीक्रेट मिशन, निन्जा आरसी, निन्जा राइडेन रिवेंज, स्टॉर्म फाल सागा ऑफ सरवाइकल, रोबोलॉक्स, रेड वाइपर जैसे गेम ज्यादा हिंसक है। यह मारधाड़ वाले गेम हैं। 90 फीसदी बच्चे इन्हीं गेम को खेलते हैं।
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पहले दादी-नानी पढ़ी-लिखी नहीं होती थी तो रामायण-महाभारत की प्रेरणादायी कहानियां सुनाती थीं। अब पढ़े-लिखे होने के बाद भी मां-बाप घर पर किताबों को कम या ना के बराबर समय दे रहे हैं। अखबार तक पढ़ने की आदत छूट रही है। व्यापार, नौकरी से लौटने के बाद लोगों के हाथ में टीवी का रिमोट या फिर मोबाइल फोन आ जा रहा है। बिस्तर पर सोने के समय तक लोग घंटों रील देख रहे हैं। बगल में बच्चा भी यही देख रहा है।
- अपर्णा पांडेय, असिस्टेंट प्रोफेसर, सोनपति देवी महिला महाविद्यालय
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युवाओं के जीवन, कार्य व्यवहार में मशीनों यानी मोबाइल फोन, लैपटॉप का एक व्यापक हस्तक्षेप हो गया है। इसे तोड़ने की जरूरत है। मोबाइल फोन की वजह से बहुत से बच्चों को आंख के डॉक्टर, मनोचिकित्सक के पास जाने की जरूरत पड़ रही है। बच्चों की यह कोशिश होनी चाहिए कि वह किताबों, लेखकों से जुड़ें। मगर उनमें यह आदत तुरंत नहीं आएगी यह सतत प्रक्रिया है। माता-पिता को देखकर ही बच्चे सीखते हैं। हम खुद किताबों को दरकिनार कर हर समय मोबाइल फोन से चिपके रह रहे हैं। यदि परिवार के बड़े पढ़ने की आदत डालेंगे तो बच्चे भी किताबों से दोस्ती करने लगेंगे।
डॉ. शांति शरण मिश्रा, साहित्यकार
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युवाओं को जिस विश्वविद्यालय में सबसे पहले शिक्षित होना चाहिए, उस विश्वविद्यालय में ही बहुत गहरा बदलाव आया है। युवाओं का यह विश्वविद्यालय है उनका परिवार। ज्यादातर घरों में किताबों का कोना सिमट रहा और टीवी, मोबाइल फोन, टैबलेट, लैपटॉप की जगह बढ़ती जा रही है। तमाम घरों में माता-पिता, दोनों काम करने वाले हैं। उनकी अपनी व्यस्तता है। इस व्यस्तता की वजह से बच्चों को जिस तरह से पालना चाहते हैं, वैसे पाल नहीं पाते।
-प्रो. दिग्विजय नाथ पांडेय, प्राचार्य, जवाहर लाल नेहरू पीजी काॅलेज महराजगंज
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बच्चों ही नहीं बड़ों में भी पढ़ने की आदत खत्म हो रही है। मनोरंजन के नए साधन विकसित हुए हैं। इसका दुष्परिणाम क्या और कितना होगा, अभी यह साफ कह पाना मुश्किल है। मगर इतना जरूर है कि जीवन के प्रति लोगों की गंभीरता खत्म हो गई है। लोग तात्कालिकता में जी रहे हैं। यह तात्कालिकता अवसाद को जन्म देती है। किताबों से ज्ञानार्जन होता है। मगर तात्कालिकता किताबों से दूरी बना रही है।
- डॉ. विपिन यादव, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी
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अपना व्यवहार बदलकर बच्चों में भरें संस्कार
महराजगंज। आप भी चाहते हैं कि आपका लाडला किताबों से दोस्ती करे, उसमें अच्छे संस्कार हों। घंटों मोबाइल फोन पर रील न देखे, न गेम खेले। ऐसे विषय, घटनाओं को न तलाशे, जो उसके लिए हितकर न हों तो पहले आपको अपनी आदत बदलनी होगी। घंटों मोबाइल फोन पर रील देखने, गेम खेलने से बच्चों की आंखें खराब होने, व्यवहार में चिड़चिड़ापन आने से हम डॉक्टर, मनोचिकित्सक के पास तो दौड़ जा रहे हैं, मगर मूल वजह पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। इससे साहित्यकार भी इससे चिंतित हैं। उनका मानना है कि समय रहते तेजी से गहराती इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया तो बहुत जल्द बच्चे किताबों की महत्ता के साथ ही धर्म, संस्कृति, परंपरा और संस्कार को भी पूरी तरह भूल जाएंगे। करते हैं, उन्हीं को आत्मसात कर बच्चे भी वैसा ही व्यवहार करते हैं। बच्चों की पहली पाठशाला, पहला विश्वविद्यालय उनका घर और परिवार होता है।