रिपोर्ट दर्ज होने के बाद भी लटका रहता है मामला, पीड़ित दर-दर की ठोकर खाने को रहते हैं विवश
संवाद न्यूज एजेंसी
महराजगंज। जमीन की खरीद-फरोख्त के दौरान जालसाजों के फेर में फंस गए तो तहसील और थाने का चक्कर लगाने में एड़ियां घिस जाएंगी। भागदौड़ कर किसी तरह से रिपोर्ट दर्ज भी हो गई तो विवेचना पूरी होने की राह आसान नहीं होगी। पीड़ितों का इधर-उधर चक्कर लगाना पड़ता है। कभी तहसील तो कभी थाने का चक्कर लगाने को पीड़ित विवश रहते हैं।
जानकारी के अभाव में जमीन खरीदने के दौरान लोग जालसाजी का शिकार हो जाते हैं। लालच देकर दलाल जमीन बेचने के बाद किनारा कस लेते हैं। इसके बाद जमीन खरीदने वालों की परेशानी बढ़ जाती है। किसी तरह से भागदौड़ करने के बाद अगर केस दर्ज हो जाय तो विवेचना पूरी होना आसान नहीं होता है। कानून पेच में उलझे पीड़ित को इधर-उधर भटकना पड़ता है। हमेशा मुकदमे की तारीख देखने से लेकर थाने तक पीड़ित चक्कर लगाते हैं। कई बार ऐसा मामला आता है कि जमीन खरीदने वाले व्यक्ति को कब्जा भी नहीं मिल पाता है। पहले तो मोटी रकम खर्च हो जाती है, दूसरे कब्जा के लिए इधर-उधर भटकना पड़ता है।
विक्रेता कब्जा नहीं करने देते हैं। फर्जी दस्तावेज तैयार कराकर जमीन को बेच देने, एक ही जमीन या प्लाट कई लोगों को बेच कर लोगों के रुपये हड़प लेते हैं। पीड़ितों को मुकदमा दर्ज कराने के लिए जूझना पड़ता है। तहरीर लेकर पीड़ित जब थाने पर जाते हैं तो पुलिस सुनवाई नहीं करती। इसके बाद लोग एसपी के पास फरियाद करते हैं। एसपी के संज्ञान में मामला आने पर ही एफआईआर दर्ज होती है। इसके बाद पुलिस के विवेचना की प्रक्रिया शुरू होती है।
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जांच की यह प्रक्रिया अपनाती है पुलिस
दरोगाओं का कहना कि जमीन की जालसाजी से जुड़े मामलों में पुलिस सबसे पहले यह जानकारी जुटाती है कि किससे गलती हुई है। उसे चिह्नित किया जाता है। उसके बाद सभी तथ्यों को केस डायरी (सीडी) में दर्ज किया जाता है। इसकी कार्ययोजना बनाकर उच्चाधिकारियों को बनाकर उनसे अनुमति ली जाती है। धोखाधड़ी के आधार पर साक्ष्य जुटाकर विवादित दस्तावेजों का प्रमाणीकरण, सभी पक्षों के हस्ताक्षर, अंगूठा छाप इत्यादि जुटाया जाता है। दरोगाओं के मुताबिक सबसे ज्यादा समय तहसील से रिकार्ड जुटाने में लगता है।
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दस्तावेजी प्रमाण जुटाने की वजह से बिलंब होता
जालसाजी के मुकदमों में दस्तावेजी प्रमाण जुटाने की वजह से बिलंब होता है। जब तक मामले की जांच चलती है। तब तक वादी खुद या अपने अभिवक्ता के जरिये पैरवी में जुटे रहते हैं। दीवानी कचहरी के अधिवक्ताओं का कहना है कि बिना विवेचना पूरी हुए कोर्ट में चार्जशीट दाखिल नहीं होगी। चार्जशीट फाइल होने के बाद मुकदमे की सुनवाई शुरू होगी। विवेचना में किसी तरह के दस्तावेज की कमी से अभियुक्त को मुकदमे लाभ मिल सकता है। चार्जशीट समय से फाइल नहीं होने के कारण जेल भेजे गए अभियुक्तों को आसानी से जमानत मिल जाती है।
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यह होती है विवेचना की प्रक्रिया
जमीनों की खरीद बिक्री में हुई जालसाजी के प्रकरणों में सबूत जुटाने में काफी समय लगता है। दर्ज मुकदमे के आधार पर दरोगा (विवेचक) कार्रवाई शुरू करते हैं। इसमें सबसे पहले वह पीड़ित के पास मौजूद दस्तावेजों की फोटो काफी मांगते हैं। उसके मूल दस्तावेजों की जांच करते हैं। इसके बाद विवेचक निबंधन कार्यालय, तहसील और भू राजस्व विभाग के रिकार्ड के लिए लिखापढ़ी करते हैं। तहसीलदार के नाम से आवेदन करके रिकार्ड की प्रमाणित छायाप्रति मांगते हैं। इसमें काफी समय लग जाता है। कभी विवेचक के पास समय नहीं होता है तो कभी राजस्वकर्मी मौजूद नहीं रहते। इससे विलंब होता है।
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बातचीत
चार्जशीट के लिए 90 दिन का समय निर्धारित है। इसके बाद भी पुलिस लापरवाही करती है। जमीन या अन्य जालसाजी के मामलों में दस्तावेजी प्रमाण जुटाने में विलंब होने का हवाला विवेचक देते हैं। लंबित मामलों का निस्तारण करने के लिए पीड़ितों को थाने से लेकर पुलिस अधिकारियों का चक्कर लगाना पड़ता है। सभी प्रक्रिया पूरी होने में देर हो जाता है।
- सतीश कुमार पांडेय, अधिवक्ता
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जालसाजी के मुकदमों की विवेचना में प्रमाण जरूरी होते हैं। जमीन के मुकदमों में पुलिस को रजिस्ट्री कार्यालय, तहसील सहित अन्य जगहों से कागजात लेने पड़ते हैं। राजस्व के रिकार्ड जुटाने में समय लगता है। इस वजह से भी विवेचना में विलंब होता है। कभी-कभी कुछ विवेचक जानबूझकर मामले को टालते हैं।
संतोष कुमार श्रीवास्तव, अधिवक्ता, दीवानी कचहरी
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केस नंबर एक
सेवानिवृत्त सीनियर ऑडिटर राजेश द्विवेदी निवासी अलीनगर गोरखपुर की जिले के निचलौल शहर के कटरा चौराहे पर स्थित अराजी संख्या 2188 क्षेत्रफल में 0.4740 हेक्टेयर भूमि है, जिसमेे से जालसाजों में 19 जुलाई को एक एकड़ 18 डिस्मिल भूमि को फर्जी तरीके से दूसरे व्यक्ति के नाम से बैनामा कर दिया। शेष बचे भूमि को रजिस्टर्ड एग्रीमेंट करा लिया। मामले की जानकारी होने पर काफी भागदौड़ करने के बाद पुलिस जुलाई 2022 के अंत में जालसाजों पर संबंधित धाराओं में केस दर्ज किया। इस प्रकरण का विवेचना अभी तक पूरा नहीं हो सकी।
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केस नंबर दो
10 सितंबर 2022 को निचलौल पुलिस ने फर्जी तरीके से बैनामा करने के मामले में उपनिबंधक सहित 11 लोगों पर केस दर्ज किया था। अखिलेश द्विवेदी गोरखपुर शहर के अलीनगर में रहते हैं। इनके पिता भालेन्दू देव एवं चाचा आनंद देव और शशिदेव के नाम से निचलौल शहर में अराजी संख्या 2188 क्षेत्रफल में 0.4740 हेक्टेयर भूमि है। पिता भालेन्दू देव की सात सितंबर वर्ष 2014 को मौत हो चुकी है। चाचा आंनद देव बीमार हैं, जो बिस्तर छोड़ने में असमर्थ हैं। इनके बाद भूमि की देखरेख करने वाला कोई नहीं था। इसका फायदा उठाते हुए कुछ लोगों ने 19 जुलाई 2022 को मृत भालेन्दू देव, आंनद देव व शशिदेव के स्थान पर फर्जी फोटो लगाकर उक्त भूमि को रजिस्ट्री कार्यालय में अपने नाम से बैनामा करा लिया। मामला न्यायालय में विचाराधीन है।
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कोट
विवेचना का निस्तारण समयबद्ध किया जाता है। सभी जरूरी प्रक्रिया पूरी करने के बाद ही विवेचक रिपोर्ट लगाते हैं। इसमें कोई लापरवाही पुलिस नहीं करती है।
आतिश कुमार सिंह, अपर पुलिस अधीक्षक