घायल तेंदुआ रातभर दर्द से तड़पता और दहाड़ता रहा। अगर बेहोश करने के संसाधन यहां मौजूद होते, तो उसकी जान बच सकती थी। जनपद में एक वर्ष के अंदर विभिन्न हादसों में पांच तेंदुओं की मौत हो चुकी है।
जिले में जंगली जानवरों के इलाज के लिए पर्याप्त संसाधन और विशेषज्ञों की कमी सामने आई है। तेंदुए को बेहोश करने के लिए जरूरी उपकरण और विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं थे। घायल तेंदुआ काफी देर तक दर्द से दहाड़ता रहा, जिससे उसकी आक्रामक स्थिति को देखते हुए कोई भी उसके पास नहीं जा सका। बाद में जब वह थोड़ा शांत हुआ तो जाल के जरिए उसे पकड़कर उपचार शुरू किया गया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते उसे बेहोश कर इलाज किया जाता तो संभवतः उसकी जान बचाई जा सकती थी।