ललितपुर। जनपद की माटी में जन्मे 93 वर्षीय अधिवक्ता लक्ष्मी नारायण तिवारी के कर्तव्य मार्ग में भले ही कितनी रुकावटें आई हो, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। ललितपुर जनपद बनने से पहले वह बेतवा नदी नाव से पार कर सत्र न्यायालयों में वादकारियों की पैरवी करने झांसी जाते थे। उन्होंने कमजोर तबके और शिक्षक से कभी मेहनताना नहीं लिया। वर्ष 2011 में उनका काव्य संग्रह क्रांति दूतों की मिशाल प्रकाशित हुआ जिसमें 245 कविताएं संग्रहीत हैं, जो हिंदी की उच्च स्तरीय कविताएं हैं।
शहर के महावीर पुरा निवासी लक्ष्मी नारायण तिवारी ने वर्ष 1955 में इलाहाबाद यूनीवर्सिटी से बीए करने के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय से 1955 में एलएलबी और 1956 में हिंदी से एमए किया। वह पीएचडी करना चाहते थे, लेकिन पिता हरदास तिवारी की इच्छा के चलते उन्होंने वकालत की वह करीब 67 साल से तत्कालीन जनपद झांसी व वर्तमान में ललितपुर जनपद के सत्र न्यायालयों और अन्य अदालतों में वकालत करते हुए हजारों वादकारियों को न्याय दिलवा चुके हैं। फौजदारी के अधिवक्ता होने के साथ-साथ उनकी शख्सियत का एक और खास पहलू है, जिसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है, वो यह कि वे हिंदी के बहुत अच्छे कवि हैं। उनकी कविताओं का संग्रह क्रांति दूतों की मशाल हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। उनकी भाषा शैली बहुत मधुर, संतुलित और बोधगम्य है। उनके गीतों और कविताओं में वर्तमान जीवन की सच्चाइयों को उजागर किया गया है जिनमें उनकी सच्चाई और बेबाकी के दर्शन होते हैं, जैसे आजादी के बाद मुल्क में, सुख समृद्धि के इंतजार में, ऊब गया हूं देख-देख कर, उगता सूरज ढलती शामें, हमको है महसूस हुआ अब, राजनीति पर निर्भर होकर, हमने जीवन मूल्य खो दिए, वर्षों झूठे स्वप्न संजो कर आदि प्रमुख रहीं हैं। उनकी कविताओं में वर्तमान राजनीति, सामाजिक विडंबनाओं और जीवन की विवशताओं को चित्रण देखने को मिलता है। हिंदी के अलावा अंग्रेजी और उर्दू के भी अच्छे जानकार हैं। उनको मिर्जा ग़ालिब, मीर, डॉ. इकबाल जैसे उर्दू के नामचीन शायरों के दर्जनों शेर आज भी याद हैं। वह आज भी सबसे मुस्करा कर सरलता के साथ मिलते हैं।
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