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मानव जीवन पंच इंद्रियों में उलझने के लिए नहीं

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मानव जीवन पंच इंद्रियों में उलझने के लिए नहीं
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पाली। श्री चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में मुनिश्री प्रवर सागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते कहा कि जिनेंद्र देव की प्रतिमा के सामने खड़े होकर हे प्रभु! जो गुण आपमें विद्यमान है, वह हमें भी प्राप्त हों, ऐसी भावना होनी चाहिए। लेकिन, संसारी जीव इसके विपरीत भोगों की वस्तुओं और पंच इंद्रियों के विषयों में उलझा रहता। उन्होंने उदाहरण देते बताया कि जो पत्थर नुकीले और खुरदरे होते हैं, पानी के बहाव से वह भी गोल और चिकने हो जाते हैं। इसी प्रकार जिनवाणी में बहकर लोग कर्म चेतना से ज्ञान चेतना को प्राप्त कर सकता है। इसके लिए संसार से मोह को त्यागकर मोक्ष पुरुषार्थ करना पड़ेगा। संसार में तीन प्रकार की चेतनाएं पायी जाती हैं, जिसमें कर्म चेतना, कर्मफल चेतना जो विभाव से युक्त है और ज्ञान चेतना जो स्वभाव से युक्त है। अनादिकाल से यह जीव इन दोनों चेतनाओं को प्राप्त कर जन्म-मरण का दुख भोग रहा है। धर्मसभा में सुरुचि मोदी ने मंगलाचरण कर मांगलिक क्रियाएं कीं। इस दौरान सुलोचना सतभैया, रश्मि वैद्य, सरला रसिया, दीप्ति रसिया, गुणमाला जैन उपस्थित रहीं।
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