बिना उपकरणों के सिर्फ पिंजरों से वन विभाग कैसे काबू पाएगा जंगल जानवरों पर
संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। हाल में प्रमुख वन संरक्षक यहां आए थे, उनके सामने जंगली जानवरों जैसे चीता, तेंदुआ आदि को पकड़ने के लिए पिंजरे की मांग रखी गई थी। उन्होंने जल्द पिंजरा उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया था। अब पांच पिंजरे भेज दिए गए हैं, इनमें दो छोटे व बड़े पिंजरों के सेट हैं, तो एक पिंजरा छोटे जानवरों के लिए भेजा गया है। मजेदार बात यह है कि ट्रैंक्यूलाइजर गन नहीं भेजा गया है, जिसके बिना किसी जंगली जानवर पर काबू नहीं पाया जा सकता।
यहां अधिकांश भूभाग में जंगल है, जिसमें दुर्लभ वन्यजीव विचरण करते हैं। कभी-कभी जंगलों के आसपास ग्रामीण इलाकों में खूंखार जानवरों के विचरण करने से दहशत पैदा हो जाता है। हाल में देवगढ़ वन क्षेत्र के ग्राम गढ़ौली में एक तेंदुआ शिकारी के जाल में फंसकर घायल हो गया था। वन विभाग को इसे पकड़ने के लिए कानपुर से टीम व झांसी से पिंजरा मंगाना पड़ा था। इनके आने में काफी देर हो जाने से देर रात काफी मशक्कत के बाद तेंदुआ को पकड़ा जा सका था। इसके बाद पिंजरे के लिए वन विभाग ने आलाधिकारियों को पत्राचार किया था। अब वन विभाग ने शेर की प्रजाति के जानवरों को पकड़ने के लिए पिंजरा भेजा है।
जनपद में नहीं है ट्रैंक्यूलाइजर गन
पिंजरे तो भेज दिए गए हैं, लेकिन खतरनाक जानवरों पर काबू पाने के लिए ट्रैंक्यूलाइजर गन नहीं होने से इसका विशेष फायदा नहीं होने वाला। ट्रैंक्यूलाइजर गन से दो सौ से छह सौ मीटर दूर से जानवरों को बेहोश करने के लिए इंजेक्शन दिया जाता है। इस गन के उपलब्ध न होने से खतरनाक जानवरों को पकड़ने में दिक्कत बनी रहेगी।
दो सेट बड़े व एक छोटा पिंजरा आया है। विभाग में चिकित्सक तैनात न होने के कारण ट्रैंक्यूलाइजर गन नहीं भेजी गई है। इस गन से बेहोशी का इंजेक्शन बिना चिकित्सक की सलाह के नहीं दिया जा सकता है।
गौतम सिंह प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी।