एससीएसटी एक्ट के झूठे मामलों पर बुद्धिजीवी चिंतित
झूठे मुकदमे पाए जाने पर कठोर कानून की मांग बढ़ी
किसी राजनीति से प्रेरित तो किसी ने एक्ट को बताया दलित हितैषी
अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर। केंद्र सरकार द्वारा संशोधन के बाद संसद में एससीएसटी एक्ट बिल के पुराने स्वरूप को बनाए रखने के अध्यादेश लागू किया गया है। लेकिन शहर का वुद्धिजीवी वर्ग इस एक्ट में द्वेषवश झूठे मामलों में कार्रवाई पर चिंतित है और ऐसे झूठे मामले सामने आने पर कठोर कानून बनाने की मांग पर जोर दिया है।
केंद्र सरकार द्वारा एससीएसटी एक्ट में संसद में संशोधन के बाद झूठे मामलों को लेकर सामान्य वर्गों के लोगों में यह बिल खटक रहा है। इसका देश में अपने स्तर से विरोध भी हो रहा है। आजकल सोशल मीडिया चाहे फेसबुक, वाट्सएप या ट्विटर वहां भी इस विरोध को प्रकट करके सरकार को चेताने या इस दिशा में आगे न जाने का जनमत प्रकट किया जा रहा है। लेकिन सरकार इतने बड़े सवर्ण एवं पिछड़ों के वोट बैंक की परवाह न करके एससीएसटी एक्ट में गिरफ्तारी के प्रावधान को और कड़ा करने के लिए इतने विरोध के बावजूद अडिग है। कानूनविज्ञ भी बताते हैं कि जब सामान्य कानून से किसी सामाजिक कुुरीति का दमन नहीं हो पाता है तो विशेष अधिनियम बनाने पड़ते हैं, जिसके अधीन ही एससीएसटी एक्ट 1989 बनाया गया था। इससे सामाजिक भेदभाव को कम करने में मदद भी निश्चित रूप से मिली है, लेकिन विशेष अधिनियम कुछ समय बाद दुरुपयोग के शिकार हो जाते हैं, उसमें चाहे एससीएसटी एक्ट या दूसरे अन्य एक्ट हो जैसे दहेज प्रथा, एनडीपीएस एक्ट आदि। इससे जब एक्ट में दुरुपयोग के मामले न्यायालयों में पहुंचते हैं तो उनमें संशोधन की जरूरत महसूस होती है, इसी के तहत गत महीनों पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने लाखों मामलों पर विचार करने के बाद एक्ट में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगाने का निर्णय दिया था। किसी अधिनियम या किसी अधिनियम में रिपोर्ट लिखाए जाते ही बिना जांच आरोपी को गिरफ्तारी करना देश की कानून व्यवस्था एवं शीर्ष अदालतों के निर्णय के अंतर्गत सही नहीं है। अमर उजाला द्वारा जब बुद्धिजीवियों से इस संदर्भ में बात की गई तो किसी ने इस एक्ट को राजनीति से प्रेरित बताया तो किसी ने एक्ट को दलित हितैषी बताया।
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कैप्सन-राजेश देवलिया।
एक्ट धारदार होने से जातिगत दायरे कम होंगे
विधि विशेषज्ञ बताते हैं कि सामान्य व्यक्ति के साथ मारपीट, गालीगलौज व धमकाने का मुकदमा देश के कानून में संज्ञेय अपराध नहीं है, जिसमें पुलिस इसकी एनसीआर दर्ज कर भी न तो स्वयं जांच करेगी और न ही कानून में उसे जांच करने का अधिकार मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना है। जबकि यही अपराध किसी जाति विशेष के साथ होने पर यह एक्ट इतना धारदार बनाया जा रहा है कि उसे आरोप के साथ ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा और उसे अग्रिम जमानत नहीं दी जाएगी, जो बहुत गलत है। अपराध से अधिक दंड लोगों को पीड़ित करने वाला है, इस संशोधन के बाद अब जातिगत दायरे कम होने की बजाए बढ़ने की संभावना अधिक होती जा रही है।
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कैप्सन-लक्ष्मी अहिरवार।
बिल सही, लेकिन झूठे मुकदमों पर कठोर कार्रवाई जरूरी
संसद में जो बिल पास हुआ है, वह सही है। रिपोर्ट दर्ज होने पर गिरफ्तारी नहीं होने पर जांच में दोषी बच जाते हैं। लेकिन यह बिल जल्दबाजी में लाया गया है, इसमें संशोधन कर झूठे मामले पाए जाने पर कोर्ट से कठोर कार्रवाई का प्रावधान भी होना चाहिए, जिससे झूठे मुकदमों से कोई निर्दोष को नहीं फंसाया जा सके। यह बिल फिलहाल राजनीति से अधिक प्रेरित लगता है।
-लक्ष्मी अहिरवार, पूर्व अध्यक्ष नेहरु महाविद्यालय।
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कैप्सन-बसंत जैन।
सुप्रीम कोर्ट ने डाटा के आधार पर किया था संशोधन
न्याय पालिका के आदेश को कार्यपालिका द्वारा बदलना गलत है। सुप्रीम कोर्ट ने डाटा के आधार पर एससीएसटी एक्ट में संशोधन किया था। इसमें 80 प्रतिशत मामले झूठे पाए थे, इसी के आधार पर ही यह संशोधन की जरूरत सुप्रीम कोर्ट को महसूस हुई होगी। लेकिन एफआईआर के साथ ही गिरफ्तारी से इसका दुरुपयोग अधिक होगा और इससे भ्रष्टाचार भी अधिक बढ़ेगा। मैं खुद इस एक्ट के मामले में पीड़ित हूं और संघर्ष कर रहा हूं।
बसंत जैन, पीड़ित शिक्षक।