18 दिन गुजरने के बाद भी जांच जारी
- पिछले महीने तालबेहट में सड़क पर हुआ था प्रसव
- महिलाओं को दुत्कारने की घटनाओं पर नहीं लगा अंकुश
अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर।
जनपद में संस्थागत प्रसव बढ़ने के बाद भी अस्पतालों में गर्भवती महिलाओं को दुत्कारने और सुविधा शुल्क मांगने की घटनाओं पर अंकुश नहीं लग सका है। इसकी प्रमुख वजह लापरवाह कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं हो पाना है। पिछले महीने तालबेहट सीएचसी में प्रसव कराने पहुंची जखौरा ब्लॉक के हर्षपुर गांव निवासी द्रोपती पत्नी लक्ष्मण सहरिया को वहां के स्टाफ ने भर्ती कराने के वजह उसे भगा दिया था। इसके बाद महिला ने टेलीफोन एक्सचेंज के पीछे सड़क पर बच्चे को जन्म दिया था। मामला मीडिया के माध्यम से उठा तो डीएम ने उसे जिला महिला अस्पताल में भर्ती कराने के बाद मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए थे। घटना के 18 दिन गुजरने के बाद भी जांच कहां तक पहुंची ये कोई नहीं जानता।
चिकित्सकों का मानना है कि सुरक्षित प्रसव के लिए संस्थागत प्रसव का होना बहुत जरूरी है। चाहे वह सरकारी अस्पताल में हो या निजी अस्पतालों में। संस्थागत प्रसव का मतलब चिकित्सा संस्थान में प्रशिक्षित और सक्षम स्वास्थ्य कर्मचारियों की निगरानी में बच्चे को जन्म देना है। जहां स्थिति को संभालने और माता व शिशु के जीवन को बचाने के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध रहती है। घरेलू प्रसव की तुलना में अस्पतालों में प्रसव कराने से जच्चा-बच्चा दोनों की अच्छी तरह से देखभाल की जाती है। अगर बच्चा घर पर पैदा होता है, तो अस्पष्ट वातावरण से संक्रमण होने की संभावना अधिक होती है। यह नवजात के जन्म की जटिलताओं को संभालने में बहुत कठिन और कभी-कभी असंभव हो सकता है। संस्थागत प्रसव कराने से शिशु और मातृ-मृत्यु दर को कम किया जा सकता है। वहीं, माता और शिशु के स्वास्थ्य की स्थिति में वृद्धि भी की जा सकती है। सरकार की ओर से सरकारी अस्पतालों में प्रसव को बढ़ावा देने के लिए जननी सुरक्षा योजना चलाई जा रही है। जिसके तहत किसी भी सरकारी अस्पताल में प्रसव कराने से प्रसूति को आर्थिक सहायता भी दी जाती है। योजना में ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसूति को 1400 रुपये एवं शहरी इलाकों में 1000 रुपये की मदद दी जाती है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने प्रसूति गृह और ऑपरेशन कक्ष में देखभाल में गुणवत्ता परक सुधार के उद्देश्य से हाल ही में लक्ष्य नामक कार्यक्रम की घोषणा की है। इस कार्यक्रम से प्रसूति कक्ष, ऑपरेशन थिएटर और प्रसूति संबंधी गहन देखभाल, आईसीयू में गर्भवती महिलाओं की देखभाल में सुधार होगा। इस सब के बाद भी पिछले महीने 24 अप्रैल को तालबेहट के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव कराने पहुंची जखौरा के हर्षपुर गांव निवासी द्रोतपी के साथ वहां तैनात कर्मचारियों ने जो कुछ किया, तो सरकार की सभी सुविधाओं को झूठा साबित कर रहा है। महिला को सीएचसी में तैनात कर्मचारियों ने उसे भर्ती करने के वजह उसे परिसर से भगा दिया था। जिसके बाद उस महिला का खुले में प्रसव करना पड़ा। मामला मीडिया के संज्ञान में आने के बाद डीएम के आदेश पर उसे जिला महिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। घटना के तीन सप्ताह गुजरने के बाद भी अब तक मजिस्ट्रेटी जांच कहां पहुंची इसके बारे में कुछ भी पता नहीं चला सका है।
राज्य सांख्यिकी की रिपोर्ट में सुधरा प्रसव का स्तर
- एक ओर जिले में तालबेहट जैसी घटनाएं सहित लगातार प्रसव के दौरान महिलाओं को परेशान करने की घटनाएं सामने आ रही है। वहीं, नीति आयोग की राज्य सांख्यिकी की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में जनपद में सरकारी अस्पतालों में प्रसव के आंकड़े में बेहतर सुधारा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक 2006 में शिशु-मृत्यु दर 71 प्रति एक हजार जन्म रही। जबकि 2016 में 43 प्रति एक हजार जीवित जन्म में है। 2006 में प्रदेश की मातृ-मृत्यु दर 440 प्रति 1 लाख जीवित जन्म में थी, जो 2016 में 285 प्रति 1 लाख जीवित जन्म हो गई। 2006 की तुलना में बहुत कम रही थी। नेशनल परिवार हेल्थ सर्वे के अनुसार जनपद में 84 प्रतिशत संस्थागत प्रसव हुए हैं।
लापरवाहों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई
- प्रसव के मामले में जो भी लापरवाही सामने आ रही हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।
डा. प्रताप सिंह, मुख्य चिकित्साधिकारी
कही जांच में लीपापोती तो नहीं हो रही
- तालबेहट के सीएचसी में महिला के साथ हुई घटना के बाद से करीब तीन सप्ताह का समय गुजर गया है। लेकिन जांच में अब तक कर्मचारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है, जांच कहां तक पहुंची है। इसके बारे में कुछ भी पता नहीं चल पा रहा है। सूत्रों के मुताबिक जांच के घेरे में फंसे कर्मचारियों ने क्षेत्र के रसूखदारों से मिलकर द्रोपती के पत्नी लक्ष्मण को रुपये देकर बाहर मजदूरी करने के लिए भेज दिया था। बड़ी मुश्किल में द्रोपती की सांस ने सामने आकर एसडीएम को अपने बयान दर्ज कराए।