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रानीबाग, राजस्व नक्शा भी है बड़ा गड़बड़झाला

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रानीबाग राजस्व नक्शा में भी है बड़ी गड़बड़ी
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ललितपुर।
रानीबाग प्रकरण में रोज नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं, अब इसी मामले में राजस्व नक्शा में भी बड़ी गड़बड़ होने की संभावना जताई जा रही है। तहसील और पीडब्ल्यूडी द्वारा सर्टिफाइड दो नक्शों में एक ही नंबर के दो अलग-अलग आकार दर्शाए गए हैं। इससे भू राजस्व मानचित्रों में भी गड़बड़ी होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। यही नहीं 19 वर्ष पूर्व नगर ललितपुर का भू-राजस्व नक्शा ही गायब करवा दिया गया था, जिसके नगर पालिका की करोड़ों रुपये की नजूल की और निजी भूमि दर्ज है।
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रानी बाग प्रकरण में विवाद की स्थिति वर्ष 1961 से उत्पन्न हुई, जब उत्तर प्रदेश सरकार की अनुुमति के बिना टीकमगढ़ के महाराज देवेंद्र सिंह जू देव द्वारा अपनी निजी संपत्ति दिगौड़ा किला और कोठी पनमारी का उक्त रानीबाग से एवं विन्ध्य प्रदेश शासनादेश आठ दिसंबर 1954 के अंतर्गत किया गया तबादला शून्य और असंवैधानिक है और उक्त तबादले से उत्तर प्रदेश बाधित नहीं है। इस तबादले को नियत प्राधिकारी/परगनाधिकारी द्वारा ही शून्य माना गया था। उक्त रानीबाग की भूमि बैनामा के आधार पर क्रेतागण और उनके वारसान, विपक्षीगण का कब्जा और किराएदारन का कब्जा भी अनाधिकृत घोषित किया गया था। इसके बाद भारत सरकार के राष्ट्रपति की अनुमति से दो नवंबर वर्ष 1968 को उक्त महाराज देवेंद्र सिंह जूदेव के विरुद्ध दावा दायर किया गया था और उत्तर प्रदेश सरकार ने भी बेदखली की कार्रवाई करने के निर्देश उसी वर्ष दिए गए थे। राजस्व अभिलेखों में भी यह विवादित भूमि नजूल जेरे इंतजाम नगर पालिका अंकित थी और यह सार्वजनिक भूमि आदि की परिभाषा में आता है। इसके बाद से यह मामला परगनाधिकारी न्यायालय से लेकर, जिला न्यायालय, हाईकोर्ट, सुप्रीमकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट द्वारा वापस जिला जज को निस्तारण के लिए भेजा गया। इसके बाद जिला न्यायालय द्वारा फिर से नियत प्राधिकरण को उचित निस्तारण करने के आदेश दिए गए। जिस पर 10 अप्रैल वर्ष 2015 में उस समय जिलाधिकारी न्यायालय उक्त द्वारा धारा-5 का हवाला देकर अपनी शक्तियों का प्रयोग कर नजूल की भूमि को स्थानांतरित करते हुए निजी संपत्ति के रुप में घोषित कर दिया गया। वर्तमान में उक्त रानीबाग की नजूल की भूमि का प्रकरण फिर से शहर में चर्चाओं का विषय बना हुआ है, जब उक्त रानीबाग की नजूल की भूमि के संबंध में सीबीआई जांच की बात सामने आई और जिलाधिकारी द्वारा भी उक्त प्रकरण में चार सदस्यीय जिला स्तरीय अधिकारियों की जांच टीम गठित कर दी। लेकिन अब उक्त प्रकरण में एक और नया तथ्य सामने आया है, जिसमें एक ही जमीन के दो अलग-अलग सर्टीफाईड नक्शों में उक्त आराजी का नंबर तो एक ही है, लेकिन दोनों नक्शों में उक्त आराजी नंबर के आकार भिन्न-भिन्न दर्शाए गए हैं। यहां तक कि पीडब्ल्यूडी के नक्शे में भी उक्त आराजी का आकार अलग दर्शाया गया है। इससे उक्त जमीन के नंबरों के आकार में अंतर होने से बड़े गड़बड़झाले की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण बात जो वर्ष 1999 में घटित से पूर्व घटित हुई। इस वर्ष यह बात सामने आई कि नगर ललितपुर का मूल राजस्व मानचित्र तहसील से गायब हो गया। इसी तरह मानचित्र की सीट नंबर पांच भी गायब हो गई। तब तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष नीलम सिंह वर्मा ने 21 जनवरी 1999 को परगनाधिकारी सदर को पत्र लिखकर अवगत कराया था कि उक्त सीट नंबर पांच में नगर पालिका की करोड़ों रुपये की बहुमूल्य नजूल भूमि एवं निजी भूमि स्थित है। जिसको खुर्द बुर्द करने के लिए राजस्व कर्मचारियों द्वारा उक्त राजस्व नक्शा अभिलेखों से गायब करना प्रतीत होता है। जिससे आराजी नंबरों को तरमीम कराकर हित साधा जा सके। इसलिए उक्त नक्शा खोजा जाना अत्यंत आवश्यक है और यदि यहां उपलब्ध नहीं है तो यह नक्शा राजस्व बोर्ड से मंगवाया जाना जरुरी है, अन्यथा राज्यसरकार को इससे भारी आर्थिक क्षति होना निश्चित है। उस वक्त तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष द्वारा उन कर्मचारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई किए जाने की मांग की थी, जो नक्शा आदि राजस्व अभिलेख गायब कराने में शामिल हों। लेकिन तब से वर्तमान में 19 वर्ष बीत गए, लेकिन उक्त नक्शा अब तक नहीं मिल सका है और न ही राजस्व परिषद या रुढ़की से ही मंगाया जा सका है। हालांकि इस संबंध में जिलाधिकारी स्तर से कई बार राजस्व परिषद से पत्राचार जरुर किया गया, लेकिन अब तक कोई उक्त नक्शा उपलब्ध नहीं हो सका है। जानकारों की मानें तो नगर ललितपुर का गायब नक्शा मिलने के बाद कई बड़े राज भी खुलने के साथ ही कई सफेद पोश नेताओं और कई राजस्व कर्मचारी की मिलीभगत भी सामने आ जाएगी।
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