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Lalitpur News: अधिवक्ता बोले - चेक बाउंस के मुकदमों को बने अलग अदालत

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जनपद में सैकड़ों मामले हैँ लंबित, वादकारियों ने करना पड़ता न्याय के लिए लंबा इंतजार
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संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। लोन लेने से लेकर सामानों की खरीद में चैक का एक अहम स्थान होता जा रहा है, आज कल देश में सामानों की खरीद पर सिक्योरिटी के लिए चैक देना आम बात हो गई है,एक बात जितनी आम है उतनी ही गंभीर भी है,पूरे देश में चेक बाउंस के करीब 50 लाख मामले लंबित हैं। इसमें सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में लंबित हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार उत्तर प्रदेश में करीब 3 लाख चेक बाउंस के केस लंबित पड़े हैं,ऐसे में सुप्रीम कोर्ट एक मामले की सुनवाई करते हुए ऐसे मामलों के निपटाने के लिए सख्त है न्याय मित्रों के सुझाव को स्वीकार करते हुए जस्टिस एल नागेश्वर राव, बीआर गवई और एस रवींद्र भट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (एनआई) के तहत विशेष अदालतें महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात, उत्तर प्रदेश और राजस्थान राज्यों में गठित की जाएंगी। जनपद ललितपुर की अदालतों में भी हजारों मामले नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के पेंडिंग है जिस कारण अधिवक्ताओं की मांग है कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की विशेष अदालत जनपद में गठित हो, इस विषय पर अधिवक्ताओं ने विस्तृत विचार भी रखें हैं।

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वर्तमान में चेक बाउंस से जुड़े मामलों की सुनवाई नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत होती है,ऐसे मामलों का निपटारा 6 महीनों के भीतर होना चाहिए, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है और ये मामले अदालत में लंबे चलते हैं, किसी स्थिति में चेक बाउंस होने के 15 दिन के नोटिस के बाद भी अगर पेमेंट नहीं की जाती है, तो सजा हो सकती है। वित्त मंत्रालय ने चेक बाउंस से जुड़े मामलों को सिविल केस में बदलने का प्रस्ताव दिया था,लेकिन, कारोबारियों ने इसका विरोध किया, तो इसे अमल में नहीं लाया गया, व्यापारियों का कहना था कि जेल का डर खत्म हो गया तो लोग नियमों की परवाह नहीं करेंगे।
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श्रीबल्लभ करौलिया वरिष्ठ अधिवक्ता।

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कई बार वादकारी को लगता है कि अधिवक्ता को लंबी तारीखे दी जा रही है जबकि मुकदमों की अधिकता व स्पेशल कोर्ट चेक बाउंस के मुकदमों के लिए न होने के कारण वादकारी अपने आप को ठगा महसूस करते हैं,चेक बाउंस के मामले में निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट,1881 की धारा 138 के तहत अधिकतम 2 साल तक सजा दी जाती है। सामान्यत अदालतें 6 महीने या फिर 1 वर्ष साल तक कारावास की सजा सुनाती है। इसके साथ ही अभियुक्त को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 के तहत परिवादी को प्रतिकर दिए जाने निर्देश भी दिया जाता है। प्रतिकर की ये रकम चेक राशि की दोगुनी हो सकती है।
रामनरेश दुबे, अधिवक्ता।

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चेक बाउंस का अपराध 7 साल से कम की सज़ा का अपराध है इसलिए ये जमानती अपराध है। इसके अंतर्गत चलने वाले केस में अंतिम फैसले तक अभियुक्त को जेल नहीं होती है। अभियुक्त के पास अधिकार होते हैं कि वो आखिरी फैसले तक जेल जाने से बच सकता है। चेक बाउंस केस में अभियुक्त सजा को निलंबित किए जाने के लिए भी गुहार लगा सकता है। दोषी पाए जाने पर भी अभियुक्त दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 374(3) के प्रावधानों के तहत सेशन कोर्ट के सामने 30 दिनों के भीतर अपील दायर कर सकता है।
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बृजेंद्र सिंह चौहान, अधिवक्ता।
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आए दिन चेक बाउंस के नए मामले सामने आ रहे हैं अदालतों में इस तरह के केस लगातार बढ़ने लगे हैं। इनमें ज्यादातर मामलों में राजीनामा नहीं होने पर अदालत ने अभियुक्त को सज़ा दी जाती है, चेक बाउंस के बड़ते मामले गंभीर समस्या है कई कारोबारियों का करोड़ों रुपया मुकदमों के लंबित होने की वजह से फंसा हुआ है । जल्दी ही उच्च न्यायालय के पीठासीन अधिकारियों को चेक बाउंस के मामलो के लिए अलग न्यायालय बनाए जाने के लिए पत्राचार किया जायेगा।
महेंद्र कुमार जैन, महामंत्री जिला बार एसोसिएशन।
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