बच्चों को न डांटें और न ही अकेला छोड़े
नैदानिक मनोवैज्ञानिक स्तुति कक्कड़ का कहना है कि रिजल्ट आने पर बच्चों को न तो डांटें और न ही अन्य से उसकी तुलना करें। इस तरह का बर्ताव करने से बच्चा अवसाद में जा सकता है। माता-पिता नंबर कम आने पर न तो बच्चों को डांटें और न ही उसे अकेला छोड़े। बच्चों की मनोदशा समझने का प्रयास करें। संवाद बनाकर तनाव से मुक्त रखें। रिजल्ट के बाद यदि बच्चों के व्यवहार में किसी तरह का परिवर्तन दिखने पर जिला अस्पताल लाकर काउंसिलिंग कराएं, जिससे उसे तनाव मुक्त किया जा सके।
जिला अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. अखिलेश शुक्ला ने बताया कि हर अभिभावक अपने बच्चे को टॉपर बनते देखना चाहता है। इससे वह बच्चों से तरह तरह की अपेक्षाएं लगा लेते हैं मगर बच्चे की क्षमता पहचानने से चूक जाते हैं। नंबर कम आने पर उलाहना देते हैं, जिसका उनके दिल और दिमाग पर नकारात्मक असर पड़ता है। नंबर कम आने या फिर फेल होने पर बच्चों को प्रताड़ित करने के बजाय फिर से लक्ष्य पाने के लिए और अधिक मेहनत करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।