समय के साथ ही तीज-त्योहारों के तरीके बदलते जा रहे हैं। पहले टेसू के फूलों से खेली जाने वाली होली आज हर्बल रासायनिक रंगों से रंगीन है। बसंत ऋतु कामदेव की ऋतु है। टेसू बसंत का श्रृंगार है। लखीमपुर खीरी के जंगलों में टेसू के हजारों पेड़ हैं। फाल्गुन की पूर्णिमा आते-आते जंगल के अंदर और बाहरी किनारों पर टेसू के फूल इस कदर खिलते हैं कि पूरा जंगल लालिमा से भर उठता है।
हूबहू दीपक की लौ के आकर के कारण अंग्रेज साहित्यकारों टेस के फूल को फ्लेम ऑफ फायर यानि वन ज्योति नाम दिया है। लाल केसरिया रंग के टेसू के फूल बसंत की उद्दयनकारी रूप को प्रदर्षित करते हैं। टेसू को पलाश, परसा, ढाक आदि के नाम से भी जाना जाता है। टेसू के फूल जब पेड़ों से झड़ते हैं तो ऐसे लगते हैं जैसे पेड़ खुद उजुलियों में भर-भरकर धरती मां पर न्योछावर कर रहे हो। इसे देख नीरस मन भी प्रसन्न हो जाता है। पलाश के फूल को राज्य सरकार ने राज्य पुष्प घोषित किया है।
पलाश के पत्ते शुद्धता का प्रतीक
पलाश यानी टेसू के पत्ते शुद्धता के प्रतीक माने जाते है। इनके पत्तों से दोना,पत्तल और थालियां बनाई जाती हैं। कहा जाता है कि इनके पत्तल में भोजन करने से चांदी के बर्तन में भोजन करने का लाभ और फल मिलता है। इस शुद्धता के बावजूद टेसू के फूलों को पूजा के कार्यों से दूर रखा गया है।
औषधीय गुणों से भरपूर है टेसू
टेसू की जड़ से लेकर पत्ते, फूल सभी कुछ औषधीय गुणों से भरपूर है। टेसू नपंसुकता, चोट, चर्म रोग, नेत्र ज्योति, मधुमेह, हृदयरोग, थायराइड, कुष्ठ आदि विभिन्न रोगों में बेहद लाभकारी है।
लखीमपुर खीरी के बांकेगंज कस्बा में आयुर्वेद के जानकार डॉ सुनील कुमार वर्मा और आयुर्वेदिक अस्पताल के डॉ सुदीप तिवारी बताते हैं कि टेसू के फूलों से बने रंग चर्मरोगों के लिए बेहद लाभकारी हैं। उनका कहना है के आज एक बार फिर से टेसू के फूलों से होली खेलने की प्रणाली अपनाने की जरूरत है। होली के बाद मौसम बदलता है। टेसू के फूलों को पानी में उबालकर उसके गुनगुने पानी के अर्क से नहाने पर खसरा, चेचक आदि बीमारियां दूर हो जाती हैं।