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Lakhimpur Kheri News: परवान नहीं चढ़ी गैंडों को रेडियो कॉलर लगाने की योजना

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दुधवा में अपने ​शिशु के साथ विचरण करता गैंडा। स्त्रोत-वन विभाग।
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संवाद न्यूज एजेंसीबांकेगंज। दुधवा टाइगर रिजर्व में गैंडा पुनर्वास योजना के 40 साल गुजर जाने के बाद भी कई विसंगतियां कायम हैं। आबादी में पर्याप्त बढ़ोतरी के बावजूद अब तक सभी गैंडों को रेडियो कॉलर लगाने की योजना परवान नहीं चढ़ पाई है।
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दुधवा में गैंडा पुनर्वासन योजना में बढ़ती गैंडों की आबादी और अंतर प्रजनन से होनी वाली आनुवांशिक समस्याओं को बचाने के लिए करीब छह साल पहले दुधवा नेशनल पार्क के ही बेलरायां रेंज में गैंडा पुनर्वासन योजना फेज टू चालू की गई थी। यह भी कामयाबी की ओर बढ़ रही है।
अगले चरण में दोनों पुनर्वासन योजनाओं में मौजूद सभी 46 गैंडों को रेडियो कॉलर लगाने और उनमें से चार गैंडों को चिह्नितकर जंगल में स्वछंद विचरण के लिए छोड़े जाने की योजना अभी अधर में लटकी है। गैंडों को अपने पूर्वजों की धरती पर पुनर्वासित करने के लिए अप्रैल 1984 में गैंडा पुनर्वासन योजना शुरू की गई थी।
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दुधवा नेशनल पार्क के दक्षिण सोनारीपुर रेंज के बांकेताल में करीब 34 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को सौर ऊर्जा चालित बाड़ से घेरकर आसाम से लाए गए गैंडों को यहां रखा गया था। इनमें तीन मादा और दो नर गैंडे थे। बाद में दो मादा गैंडों की एक साल के अंदर मौत हो गई। गैंडा पुनर्वासन योजना को सुचारू रूप से संचालित और उनकी वंशवृद्धि करने के लिए नेपाल से 16 हाथियों के बदले चार मादा गैंडो को लाकर इनके साथ रख गया। इससे इनकी वंशवृद्धि शुरू हुई। मौजूदा समय में इनकी संख्या बढ़कर 46 हो चुकी है।
गैंडों की सुरक्षा के मद्देनजर सभी गैंडों को रेडियो कॉलर लगाने की योजना बनाई गई थी। इसके लिए बाकायदा प्रशिक्षण भी आयोजित किए गए, मगर योजना परवान नहीं चढ़ पाई। उधर, आसाम के काजीरंगा नेशनल पार्क की तरह गैंडों को सौर ऊर्जा चालित बाड़ से आजाद कर जंगल में स्वछंद विचरण के लिए छोड़े जाने की मंजूरी न मिलने के कारण योजना अधर में लटक गई हैं।
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सौर ऊर्जा चालित बाड़ से गैंडों को आजाद कर जंगल में छोड़े जाने की योजना के क्रियान्वयन की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। केंद्र सरकार से मंजूरी न मिलने के कारण मामला अधर में लटका है। मंजूरी मिलते ही चिह्नित गैंडों को जंगल में छोड़ा जाएगा।
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- ललित कुमार वर्मा, एफडी, दुधवा टाइगर रिजर्व
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