लखीमपुर खीरी। लखीमपुर नगर पालिका के तीन बार अध्यक्ष रहे लक्ष्मी नारायण सक्सेना उर्फ आगा साहब और दो बार अध्यक्ष रहने वाले कृष्ण प्रमोद तिवारी उर्फ बच्चा बाबू को लोग आज भी याद करते हैं। भले ही अब वे इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके कराए गए विकास कार्य आज भी उनकी याद दिलाते हैं। लखीमपुर नगर पालिका चुनाव में सभी प्रत्याशी आगा साहब और बच्चा बाबू जैसा विकास कराने का वादा कर रहे हैं। लखीमपुर की जनता भी एक बार फिर ऐसे ही अध्यक्ष की उम्मीद लगाए बैठी है, जो शहर को समस्याओं से उबार सके।
जाने माने अधिवक्ता लक्ष्मी नरायन सक्सेना उर्फ आगा साहब अकेले ऐसे शख्स थे, जो एक दो बार नहीं बल्कि तीन बार लखीमपुर नगर पालिका के अध्यक्ष बने और हर कार्यकाल में उन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी। आगा साहब सबसे पहले 1953 से 1957 तक नगर पालिका अध्यक्ष बने। इसके बाद 1958 से 1964 तक फिर 1971 से 1974 तक उन्होंने नगर पालिका की कमान संभाली। इससे पहले वर्ष 1926 में इनके पिता राय बहादुर सरस्वती प्रसाद सक्सेना भी लखीमपुर नगर पालिका की कमान संभाल चुके थे।
राय बहादुर सरस्वती प्रसाद सक्सेना भी अपने समय के प्रतिष्ठित अधिवक्ता थे। पूरे प्रदेश में उनका नाम था। आगा साहब ने अपने कार्यकाल में जो काम किए वह आज भी उनकी प्रशासनिक क्षमता, कार्यकुशलता और ईमानदारी की मिसाल है।
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60 साल पहले बनी मेन रोड अभी तक मजबूत
लक्ष्मी नारायन आगा ने अपने दूसरे कार्यकाल 1958 से 1964 में हीरालाल धर्मशाला से इमली चौराहे तक जिस सड़क का निर्माण कराया, वह आज भी उतनी ही मजबूती से टिकी है। बुजुर्ग बताते हैं सड़क बनाने से पहले आगा साहब ने ठेकेदार से कहा यह सड़क तुम्हें सिर्फ दो प्रतिशत कमीशन में बनानी है। तुम्हें किसी को कमीशन नहीं देना है। सारा पैसा सड़क निर्माण में लगाना है। ठेकेदार ने कहा कि यदि पीडब्ल्यूडी सड़क पास कराने में कमीशन न ले तो वह दो प्रतिशत कमीशन में सड़क बनाने को तैयार है। आगा साहब ने गारंटी ली कि पीडब्ल्यूडी को कमीशन नहीं देना पड़ेगा। आगा साहब ने खुद अपनी देखरेख में सड़क का निर्माण कराया। पीडब्ल्यूडी को बिना कमीशन के सड़क को पास करना पड़ा। आज भी यह सड़क मजबूत है। मरम्मत की भी जरूरत नहीं पड़ी।
साफ-सफाई और जनसुविधाओं पर खुद रखते थे नजर
मौजूदा माहौल में अध्यक्ष सिर्फ चुनाव के समय ही मोहल्लों में दिखाई देते हैं लेकिन लक्ष्मी नारायन आगा ऐसे अध्यक्ष थे जो अध्यक्ष रहते हुए हर दिन मोहल्लों का भ्रमण करते थे। वह खुद अपनी फिएट कार चलाते हुए रोज किसी न किसी मोहल्ले में पहुंच जाते। कार वार्ड मेंबर के यहां खड़ी कर वार्ड सदस्य के साथ मोहल्ले में भ्रमण पर निकल जाते। एक-एक नाली और गली की सफाई देखते। लोगों से समस्याएं पूछते कि मोहल्ले में साफ पानी आ रहा है कि नहीं। रोज साफ सफाई हो रही है कि नहीं। समस्याएं सुनकर उनका मौके पर निस्तारण भी करते थे। उनके समय में नाली की सफाई होने और कूड़ा उठने के बाद मशक में पानी भर कर नाली की धुलाई भी होती थी।
निर्माण में गुणवत्ता और साफ-सफाई पर बच्चा बाबू का रहा खास ध्यान
विकास कार्यों के मामले में दूसरे नंबर पर कृष्ण प्रमोद तिवारी उर्फ बच्चा बाबू का नाम आता है। बच्चा बाबू दो बार अध्यक्ष रहे। पहली बार वह 1969 से 1971 में अध्यक्ष बने। इसके बाद वह 1974 से 1977 तक अध्यक्ष रहे। इस बीच शहर की साफ-सफाई तो बेहतर रही ही। निर्माण कार्य भी खूब हुए। जो निर्माण कार्य हुए वह गुणवत्ता युक्त रहे। उन्होंने शहर में होने वाले एतिहासिक दशहरा मेले को नए आयाम दिए। उनके समय में यहां होने वाला अखिल भारतीय कवि सम्मेलन बुलंदियों पर पहुंचा और देश भर में प्रसिद्ध हुआ। कृष्ण प्रमोद तिवारी उर्फ बच्चा बाबू के दादा मोहन लाल तिवारी भी इस नगर पालिका के दूसरे अध्यक्ष रहे।