गौरीफंटा। भारत-नेपाल सीमा पर थारू जनजाति के ग्रामीण तीन दशक से रेल सेवा के लिए तरस रहे हैं। कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन गौरीफंटा तक रेल का संचालन शुरू नहीं हुआ। कई बार प्रयास हुए और मांग भी उठी लेकिन लाइन उखाड़ देने के बाद से दोबारा लाइन नहीं बिछाई गई। आज भी थारू समाज के लोग ट्रेन चलने की आस लगाए बैठे हैं।
पलिया तहसील क्षेत्र में थारू जनजाति क्षेत्र की करीब 60 हजार से अधिक की आबादी है। यह इलाका दुधवा नेशनल पार्क के साथ ही नेपाल सीमा पर स्थित है। गौरीफंटा में सीमा तक ब्रिटिशकाल में सन् 1894 में गौरीफंटा व चंदनचौकी रेलवे स्टेशन के साथ ही फुलवरिया, पौलाहा, डिगनिया हाल्ट स्टेशनों के बाद दुधवा जंक्शन बनाकर रेल का संचालन शुरू किया था।
सन् 1985 में रेल महकमे ने घाटे की बात रेल संचालन बंद करने के लिए लिखापढ़ी शुरू कर दी। 1994 के जून माह में ट्रेनों का संचालन बंद कर दिया। तत्कालीन विधायक निरवेंद्र कुमार मुन्ना ने पलिया रेलवे स्टेशन पर कई दिनों तक धरना दिया लेकिन नतीजा नहीं निकला। इसके बाद बिछी हुई रेललाइन को भी उखाड़ लिया गया।
अब करीब 30 साल बाद ऐशबाग-पीलीभीत वाया लखीमपुर-मैलानी आमान परिवर्तन कार्य होने से थारू क्षेत्र की जनता को एक बार फिर से ट्रेन चलने की उम्मीद जगी है। चुनाव के इस माहौल में थारू क्षेत्र में ट्रेनों के संचालन किए जाने की मांग फिर से उठने लगी है।
गोरी फंता रेलवे स्टेशन- संवाद
गोरी फंता रेलवे स्टेशन- संवाद