फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Lakhimpur Kheri News: बलिदानी राजनारायन ने स्वतंत्रता आंदोलन में दी अंतिम आहुति

विज्ञापन
शहीद पार्क में स्थापित प्रतिमा-संवाद
विज्ञापन

विज्ञापन

लखीमपुर खीरी। स्वतंत्रता आंदोलन के महायज्ञ में अंतिम आहुति जिले के भीखमपुर के राजनारायन मिश्रा ने दी। स्वाधीनता आंदोलन में अंतिम फांसी राजनारायन मिश्रा को नौ दिसंबर 1944 को दी गई थी। इसके बाद किसी स्वतंत्रता सेनानी को फांसी नहीं दी गई।
-

भीखमपुर में अंग्रेजों ने ढाए थे जुल्म
भीखमपुर। वर्ष 1942 में स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था। इसी दौरान सशस्त्र क्रांति के पक्षधर भीखमपुर के राजनारायन मिश्रा ने स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होकर क्रांति के लिए शस्त्र जुटाने शुरू कर दिए। वह महमूदाबाद के कोठार में जिलेदार से बंदूक मांगने पहुंच गए। जिलेदार ने राजनारायन पर बंदूक तान दी। यह देख उन्होंने बंदूक छीनकर उसी से जिलेदार को गोली मार दी। इसके बाद वह बंदूक लेकर फरार हो गए। घटना के बाद अंग्रेजों ने भीखमपुर में खूब जुल्म ढाए।
विज्ञापन


राजनारायन मिश्रा को जीवित या मृत अवस्था में पकड़े जाने पर 500 रुपये के पुरस्कार की घोषणा की गई। वे देश के विभिन्न हिस्सों में घूमते हुए क्रांति का सृजन करते रहे। मध्यप्रदेश में ब्रिटिश सरकार विरोधी कार्यों के कारण उन्हें दो महीने नजरबंद रहना पड़ा। इस दौरान उन्होंने नाम-पता बदल लिया था। जब गांधी जी ने आगा खां महल में 21 दिन का ऐतिहासिक अनशन किया, तब राजनारायन को हड़ताल कराने के दंड में मुंबई में छह माह की सजा मिली। अक्तूबर 1943 में जेल से छूटकर वह फिर उत्तरप्रदेश लौट आए। हरिद्वार, ऋषिकेश, काशी आदि स्थानों पर घूमते हुए मेरठ पहुंचे, जहां उन्हें पहचान कर गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर हत्या का मुकदमा चलाकर उन्हें 27 जून 1944 को फांसी की सजा सुनाई गई। नौ दिसंबर 1944 की सुबह लखनऊ जिला जेल में 24 वर्ष की आयु में राजनारायन को फांसी दे दी गई। फांसी के फंदे पर खड़े होकर उन्होंने वंदे मातरम गीत गाया और इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए।
-

बलिदान होने की खुशी में छह पौंड बढ़ गया था वजन
देश को आजादी कराने के खातिर राजनारायन हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए। आजादी के महायज्ञ में उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी। राजनारायन को देश के लिए बलिदान होने की इतनी खुशी थी कि फांसी के फंदे पर लटकाए जाने के दिन यानी नौ दिसंबर 1944 को उनका वजन छह पौंड बढ़ गया था।
विज्ञापन

-

गुजर-बसर को भटक रहा परिवार
देश की आजादी के लिए प्राण न्योछावर करने वाले राजनारायन मिश्रा के परिवार की हालत अब ठीक नहीं बताई जा रही है। उनके पौत्र का घर गोला में है। परिजन अब गोरखपुर में रह रहे हैं। बलिदानी के नाम से कस्बे के चौराहे पर एक विद्यालय 10 बीघा खतौनी में दर्ज है। पहले विद्यालय में पढ़ाई होती थी। दो कमरे भी बनाए गए। अब इसकी हालत खराब है। प्रधान विमलेश कुमारी मिश्रा ने चौराहे पर शहीद गेट का निर्माण कराया है। बलिदानी के भतीजे नागेश्वर प्रसाद मिश्र ने चौराहे के बीचोंबीच उनकी प्रतिमा लगवाने की मांग की है।

शहीद पार्क में स्थापित प्रतिमा-संवाद

शहीद पार्क में स्थापित प्रतिमा-संवाद

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें