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खीरी के बंशीधर शुक्ल का गीत बना था आजाद हिंद फौज का मार्चिंग सांग

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अशोक निगम
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लखीमपुर खीरी। पं. बंशीधर शुक्ल स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे योद्घा थे, जिन्होंने न केवल आजादी की लड़ाई में सक्रिय भागीदारी निभाई बल्कि अपनी रचनाओं आंदोलन को धार दी। उनकी रचना ‘कदम कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा...’ आजाद हिंद फौज का प्रमुख गीत बना। सैनिकों के मार्च पास्ट के समय यह गीत गाया जाता था।
उठो सोने वालों सबेरा हुआ है, वतन के फकीरों का फेरा हुआ है...। उठ जाग मुसाफिर भोर भयो... जैसी कई कालजयी रचनाओं का सृजन करने वाले पं. बंशीधर शुक्ल का जन्म वर्ष 1904 में बसंत पंचमी के दिन मन्यौरा गांव में हुआ था। इनके पिता छेदीलाल शुुक्ला भी अपने क्षेत्र के प्रसिद्घ कवि थे। 15 साल की उम्र उनके पिता का निधन हो गया। इससे उन्हें आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। युवावस्था में कदम रखते ही जीविकोपार्जन के लिए किताब की दुकान खोली। पिता के काव्य संस्कारों का प्रभाव उनमें बचपन से ही था। शुरुआती दौर में उन्होंने कुछ शृृंगार की रचनाएं लिखीं, लेकिन बाद में देशभक्तिपूर्ण कविताएं और जागरण गीत लिखने लगे।
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जिले के स्वतंत्रता संग्राम पर शोध करने वाले रिटायर्ड शिक्षक डॉ. रामपाल सिंह बताते हैं कि पुस्तक व्यवसाय से जुड़े होने के कारण पं. बंशीधर शुक्ल का अक्सर कानपुर आना-जाना होता था। इसी बीच उनका संपर्क अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी से हुआ। तभी से वह क्रांतिकारी साहित्य की रचना करने लगे। वर्ष 1921 से वह पूरी तरह स्वाधीनता आंदोलन के लिए समर्पित हो गए। दमदम कांड के बाद पं. बंशीधर शुक्ल ने एक अत्यंत क्रांतिकारी कविता लिखी, जो बहुत लोकप्रिय हुई। इसे खूनी पर्चा का नाम दिया गया। वर्ष 1928 में देश भर में एक ही दिन में एक साथ जारी किया गया।
खीरी बम कांड के बाद बंशीधर शुक्ल के घर पर भी दबिश दी गई। पुलिस ने उनके यहां से बरामद क्रांतिकारी साहित्य जब्त कर लिया और उन्हें छह महीने जेल की सजा हुई।
चाहे स्वदेशी आंदोलन हो या गांधी जी का नमक सत्याग्रह, सभी राजनीतिक आंदोलनों में उन्होंने खुलकर हिस्सा लिया। उन्हें आंदोलनकारियों की मदद करने में फांके तक करने पड़े लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वर्ष 1940 में पं. बंशीधर शुक्ल को तीन साल की सजा सुनाई गई। इसके बाद आजादी के आंदोलन में उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। संवाद
अवधी सम्राट की उपाधि
पं. बंशीधर शुक्ल ने अपनी रचनाओं का सृजन लोकभाषा अवधी में किया। उनके जीवन पर शोध करने वाले संगम लाल मालवीय का कहना है कि रामचरित मानस के रचयिता तुलसी दास के बाद अवधी साहित्य में पं. बंशीधर शुक्ल का नाम प्रमुख है। इसलिए उन्हें अवधी सम्राट कहा जाता है। उन्होंने अंग्रेजी शासन के दौरान किसानों की दुर्दशा और शोषण की कहानी का अपनी रचनाओं के माध्यम से मार्मिक चित्र खींचा है। कानपुर विश्वविद्यालय ने उनकी रचनाओं को हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल किया है।
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फक्कड़ और विद्रोही बने रहे बंशीधर
आजादी के बाद वर्ष 1950 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में पं. बंशीधर शुक्ल चुनाव जीतकर विधायक बने लेकिन विधायक के रूप में मिलने वाला वेतन भत्ता उन्होंने नहीं लिया। जीवन भर फक्कड़ और विद्रोही बने रहे। अफसोस कि आजादी के 75 साल बाद भी उनका कोई स्मारक जिले में नहीं बन पाया है। कुछ साल पहले लखीमपुर में मेनरोड का नामकरण उनके नाम पर जरूर हुआ है। पं. बंशीधर शुक्ल के पौत्र गौरव शुक्ल का कहना है कि महान क्रांतिकारी अवधी सम्राट पं. बंशीधर शुक्ल के नाम पर स्मारक बनना चाहिए जिससे आज की युवा पीढ़ी उनसे प्रेरणा ले सकें।
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