लखीमपुर खीरी। जंगली जानवर पाढ़ा, चीतल, भालू का पसंदीदा भोजन कटरुआ अब इंसानों की भी पसंद बन रहा है। यही वजह है कि प्रतिबंधित होने के बावजूद लोग चोरी-छिपे जंगल में जान जोखिम में डालकर कटरुआ ला रहे हैं और बाजार में बिक्री कर रहे हैं। बाजार में यह 2000 से लेकर 2400 रुपये किलो बिक रहा है। इसके खरीदार बड़ी संख्या में हैं। यह शरीर के लिए काफी पौष्टिक माना जाता है।
बरसात के बाद जंगलों से कटरुआ बाजार में पहुंचना शुरू हो जाता है। कटरुआ साल के पेड़ के नीचे जमीन को चीरते हुए निकलता है। बारिश में ही यह जमीन से निकलता है। यह दुधवा के अलावा भीरा रेंज, मैलानी रेंज और बांकेगंज रेंज के आसपास के जंगलों में खूब पाया जाता है। कटरुआ को हिरन, पाढ़ा, चीतल, भालू, बंदर, लंगूर आदि वन्यजीव बड़े चाव के साथ खाते हैं। इससे उन्हें भरपूर प्रोटीन मिलता है। प्रोटीन के चलते इंसान भी कटरुआ को काफी पसंद करता है।
कटरुआ बीनने जंगल में घुस रहे लोग
कटरुआ बीनने वाले लोगों का जंगलों में दखल बढ़ रहा है। वन विभाग की अनदेखी के चलते जंगल के आसपास रहने वाले लोग कई किलो कटरुआ लेकर बाहर आते हैं और इसे ऊंची कीमतों में बेचते हैं। मौजूदा समय में हीरालाल धर्मशाला के अलावा मुख्य बाजार में कई फेरी वाले कटरुआ की बिक्री करते दिखाई दे रहे हैं। प्रोटीन युक्त होने के साथ काले या सफेद रंग का होता है। बरसात के दिनों में जंगल के आस-पास रहने वालों लोगों के लिए यह रोजी-रोटी का साधन बनता है। हालांकि, जंगल में घुसकर कटरुआ बीनना प्रतिबंधित है।
राजधानी से लेकर मुम्बई तक पसंद किया जाता है
दो महीने तक बाजार की रौनक बढ़ाने वाला कटरुआ लखीमपुर जिले में ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों में भी काफी मशहूर है। लोग कटरुआ यहां से खरीदने के बाद लखनऊ, शाहजहांपुर, सीतापुर, रायबरेली, बहराइच सहित मुम्बई भेजते हैं। इसकी मांग इतनी है कि लोग दस महीने इसका इंतजार करते हैं।
जंगल में घुसपैठ रोकने के लिए कई टीमों का गठन किया है। जंगल में कटरुआ बीनते पकड़े जाने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। बाजारों में भी जहां कहीं यह बिकता पाया जाएगा, दुकानदार के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
ललित कुमार, एफडी दुधवा
कटरुआ को सामान्य बोलचाल की भाषा में पबवाल बोलते हैं। इसमें फाइबर भरपूर मात्रा में पाया जाता है। साथ अच्छी मात्रा में फैट और शुगर भी होती है। जिसमें एंटी आक्सीडेंट फिनालिक कंपाउंड पाया जाता है, जो पाचन क्रिया में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
डॉ. डीके सिंह, प्रोफेसर बाटनी