लखीमपुर खीरी। भारतीय अदालती व्यवस्था के लिए सोमवार से नया अध्याय लिखा जा रहा है। भारतीय संसद ने 1860 में निर्मित आईपीसी और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 को रद्द किया, तो 50 साल पुरानी सीआरपीसी को भी बदल कर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के नाम से नया कानून लागू किया है। वहीं आईपीसी के स्थान पर भारतीय न्याय संहिता बीएनएस लागू की गई है, लेकिन भारतीय साक्ष्य अधिनियम का नाम नहीं बदला है।
इन नए कानून में ज्यादातर प्राविधान पुराने ढर्रे पर हैं, लेकिन इलेक्ट्रानिक दस्तावेज, आडियो-वीडियो और आईटी एविडेंस को भी शामिल किया गया है। जो निश्चित ही बदलते हुए समाज की मांग थी। नए प्राविधान में जीरो एफआईआर को भी कानूनी मान्यता दी गई है। अब किसी भी थाने में आपराधिक घटना की सूचना अंकित की जा सकती है।
नहीं होगा पूर्व व्यापी प्रभाव
वरिष्ठ अधिवक्ता शैलेंन्द्र सिंह गौड़ ने बताया कि नए आपराधिक कानून भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 पर आधारित हैं। जो देश के किसी भी नागरिक या देश में हुए अपराध में आरोपी विदेशी नागरिक के खिलाफ मुकदमा चलाने की स्थिति में आपराधिक कानूनों को पूर्वव्यापी तौर पर लागू करने से रोकता है। घटना के समय स्थापित कानून के अलावा अन्य तरीके से आरोपी के खिलाफ कोई प्रक्रिया नहीं चलायी जा सकती या दंडित नही किया जा सकता है। यह भारतीय संविधान में ही दिया गया है।
नए कानूनों से दूर होगी पीड़ितों की दिक्कतें
जिला शासकीय अधिवक्ता फौजदारी अरविंद त्रिपाठी ने बताया कि नए कानून लागू होने से पूर्व ही अभियोजन से जुडे सहयोगियाें को प्रशिक्षण शासन स्तर पर दिलाया जा चुका है। अब नए कानून लागू होने से अपराधियों पर बेहतर तरीके से अंकुश लगेगा और पीडितों की दिक्कतों को कम किया गया है। इसमें समयबद्ध निस्तारण पर जोर दिया गया है। हालांकि यह सही है कि लोगों को काफी समय तक पुरानी धाराओं के याद रहने के कारण नई धाराओं मे काम करने के लिए ज्यादा होमवर्क करना पडेगा।
सामुदायिक सेवा भी अच्छा प्रयास
संयुक्त निदेशक अभियोजन दिलीप श्रीवास्तव ने बताया नए कानूनों में विवेचक की जिम्मेदारी तय की है, तो अदालतों की भी जिम्मेदारी तय की गई है। मुकदमों का समयबद्ध निस्तारण किया जाएगा। उनकी नजर में कई अच्छे प्रावधानों को शामिल किया गया है। जिनमें लघु फौजदारी मामलों में दंड के रूप में सामुदायिक सेवाओं को शामिल किया गया है।
पुलिस के अधिकारों का न हो दुरुपयोग
वरिष्ठ अधिवक्ता सुरेश सिंह मुन्ना बताते हैं कि नए कानूनी प्रावधान में महिला संबंधी मामलों में भी व्यापक अधिकार महिलाओं को दिए गए हैं। पुलिस के भी अधिकार बढाए गए हैं। जिनमें पुलिस कस्टडी रिमांड के लिए शुरुआती 15 दिन की बाध्यता को खत्म कर छोटे और बड़े अपराध के अनुसार समयावधि तय की गई है। विदेशी धरती पर बैठकर भारत के खिलाफ उकसाने षडयंत्र रचने और आईटी का दुरुपयोग करने के मामले में भी संज्ञान लेने का अधिकार दिया गया है।
जिला अधिवक्ता संघ के महामंत्री विश्वास श्रीवास्तव ने बताया सरकार का कदम और मंशा अच्छी है, लेकिन इतनी बड़ी आबादी में इन्हें लागू किए जाने में कुछ शुरुआती जटिलताएं तो आएंगी।
धाराओं में हुआ यह बदलाव
पहले अब
302 - 103
307- 109
304- 105
308- 110
महिला अपराध
498ए - 85
304बी- 80(2)
306- 108
354- 74
354 ए - 75
354बी- 76
354सी- 77
354डी - 78
376- 64 (1)
509- 79
संपत्ति से जुडे़ अपराध
379- 303(2)
380- 305 ए
392- 309
395- 310
420- 318 (4)
419- 319(2)