- पसगवां, मोहम्मदी, बेहजम और मितौली में जलस्तर पांच मीटर से भी नीचे पहुंचा
- गिनती की सरकारी इमारतों को छोड़ अधिकांश जगह नहीं लगा वाटर रिचार्ज सिस्टम
- 2223 वेटलैंड होने के बावजूद अब भी न चेते तो लोग तरस सकते हैं पानी के लिए
संवाद न्यूज एजेंसी
लखीमपुर खीरी। सरकारी रिकार्ड में भले ही जिले में 2223 वेटलैंड हों, लेकिन तराई की धरती से तरावट गुम होती जा रही है। पानी का संकट गहराने लगा है। वह भी तब, जब जिले में 188 नदी-नाले हैं और दो हजार से अधिक छोटे-बड़े जलाशय। हालांकि, पानी की बर्बादी फिर भी कम नहीं हो रही है।
जिले में पसगवां, मोहम्मदी, बेहजम और मितौली में जलस्तर पांच मीटर से नीचे पहुंच गया है, जबकि यह तीन से चार मीटर नीचे होना चाहिये था। जलस्तर का घटना अच्छा संकेत नहीं है। उधर, ग्राउंड वाटर डिपार्टमेंट के अनुसार, फिलहाल जिले के किसी भी ब्लॉक के डार्क जोन में जाने की स्थिति नहीं आई है। भारत सरकार और केंद्रीय भूजल बोर्ड की गाइडलाइन के मुताबिक, यदि किसी क्षेत्र में भूजल दोहन 70 फीसदी से कम है तो वह क्षेत्र सुरक्षित माना जाता है। 70 से 90 फीसदी दोहन सेमी क्रिटिकल श्रेणी में आता है। 90 से 100 फीसदी दोहन को क्रिटिकल माना जाता है। खीरी जिले के किसी भी ब्लॉक में 70 फीसदी से अधिक जल दोहन नहीं हो रहा है। इसके चलते जिले का कोई भी ब्लॉक डार्क जोन में नहीं है।
नई बनने वाली स्कूल की इमारतों में लगाए जा रहे वाटर रिचार्ज सिस्टम
जल संरक्षण के लिए नई बनने वाली सभी इमारतों में वाटर रिचार्ज सिस्टम होना जरूरी है। अफसरों का दावा है कि कलक्ट्रेट, तहसील, विकास भवन, पीडब्ल्यूडी समेत कई सरकारी इमारतों में वाटर रिचार्ज सिस्टम लगाया गया है। हालांकि, अधिकांश जगह मसलन डीआईओएस, बेसिक शिक्षा विभाग जैसे कई दफ्तरों में वाटर रिचार्ज सिस्टम नहीं है। 100 वर्ग फिट या उससे अधिक कारपेट एरिया वाले भवनों में वाटर रिचार्ज सिस्टम लगाना जरूरी है लेकिन निजी भवनों में एक दो को छोड़ कर किसी में भी वाटर रिचार्ज सिस्टम नहीं लगा है। अब नई बनने वाली स्कूल की इमारतों में भी वाटर रिचार्ज सिस्टम लगाए जा रहे हैं।
जिले में वेटलैंड की स्थिति
जिले में कुल वेटलैंड-2223
वेटलैंड का क्षेत्रफल-38119 हेक्टेयर
प्राकृतिक वेटलैंड-493
नदी-नालों की संख्या-188
झीलें-12
छोटे तालाब-1673
सीपेज एरिया-43
इस तरह हो रही है जिले में पानी की बर्बादी
जिले में पानी की बर्बादी भी कम नहीं है। पेयजल आपूर्ति के लिए बिछाई गई अधिकांश पाइप लाइन जर्जर है, जिनके टूटने से रोज हजारों लीटर पानी बर्बाद होता है। गाड़ियों की धुलाई के लिए खुले सैकड़ों सर्विस स्टेशनों पर भी हर रोज हजारों लीटर पानी बर्बाद हो जाता है। इनके अलावा घरों में गाड़ी की धुलाई, फर्श की धुलाई और फौव्वारों से भी हर दिन हजारों लीटर पानी की बर्बादी हो रही है।
जलाशयों पर अतिक्रमण से गिर रहा भूगर्भ जलस्तर, बढ़ रहा जल प्रदूषण भी
तालाबों, झीलों और नदियों में अतिक्रमण, उनमें खेती और आबादी बस जाने से भूगर्भ जलस्तर में गिरावट आ रही है। यह अतिक्रमण बाढ़ का कारण भी बन रहा है। पहले बरसात के मौसम में जब बड़ी नदियों का जलस्तर बढ़ता था तो उनका पानी सहायक नदियों, नालों और तालाबों में जाता था, जिससे बाढ़ का असर कम हो जाता था। अब सहायक नदियों-नालों का अस्तित्व खत्म होने से बाढ़ का पानी खेतों में फैल जाता है और फसलें बर्बाद होती हैं। खेती में इस्तेमाल हो रही कीटनाशक दवाओं से जल प्रदूषण बढ़ रहा है। इसका असर जलीय जैव विविधता पर भी पड़ रहा है। पानी की अशुद्घता से कई तरह की बीमारियां फैल रही हैं।
वाटर रिचार्ज सिस्टम की मॉनीटरिंग भी नहीं
गर्भ जलस्तर मानक के अनुरूप बना रहे, इसके लिए 5100 वर्ग फुट या उससे अधिक कॉरपेट एरिया वाले भवनों में वाटर रिचार्ज सिस्टम लगाना जरूरी है, लेकिन अभी इसकी मॉनीटरिंग की पुख्ता व्यवस्था नहीं है। मामले में अवर अभियंता विनियमित क्षेत्र पीके त्रिवेदी का कहना है कि कई सरकारी भवनों के अलावा निजी भवनों में भी वाटर रिचार्ज सिस्टम बनाया गया है, लेकिन तराई क्षेत्र होने के कारण यहां वाटर रिचार्ज सिस्टम कारगर नहीं हो पा रहा है। जलस्तर काफी ऊपर है इससे यह वाटर रिचार्ज सिस्टम अक्सर उफना जाते हैं। इसलिए मॉनीटरिंग तो की जाती है, लेकिन अधिक सख्ती नहीं की जा रही है। भविष्य के लिए वाटर रिचार्ज सिस्टम बनाना बहुत जरूरी है।
सर्विस स्टेशन पर गाड़ी धुलता कर्मी
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