लखीमपुर खीरी। गुरबत की तेज आग पे अक्सर पकाई भूख, खुशहालियों के शहर में क्या कुछ नहीं किया। इकबाल साजिद का लिखा यह शेर नौधन पटना गांव के कल्लू की कहानी बखूबी बयां कर देता है। गांव से काम की तलाश में आए कल्लू ने सड़क किनारे पल्ली तानकर बसेरा बनाया है। दो ईंटों का चूल्हा है। पेट की आग तेज हुई तो फावड़े पर रोटियां सेंक लीं। भूख मिटी तो ईंटों का तकिया लगाकर सो गए। अगली सुबह फिर मजदूरी।
परिवार को दो वक्त की रोटी देने के लिए नकहा ब्लॉक के नौधन पटना गांव के कल्लू को तमाम संघर्षों से जूझना पड़ रहा है। उसका बेटा पिंकू अभी भले ही उम्र से बड़ा न हुआ हो लेकिन पिता की मजबूरी समझता है और उनका पूरा साथ देता है। कल्लू ने बताया कि बरसात होने की वजह से गांव और आस-पास काम नहीं मिला तो दोनों शहर आ गए। यहां उन्हें पीलीभीत-बस्ती हाईवे के किनारे कमला डिग्री कॉलेज के पीछे बन रहे मकान में ईंट-गारा ढोने का काम तो मिल गया लेकिन रहने-खाने का कोई ठिकाना नहीं।
दोनों के लिए काम के बाद रोज घर लौटना भी काफी मुश्किल था। पैसा और समय दोनों की बचत के लिए सड़क किनारे ही पल्ली तान कर अपना बसेरा बना लिया। बर्तन के नाम पर दोनों के पास एक थाली और एक लोटा है। भूख लगने पर थाली में आटा गूंथ लिया और मजदूरी में उपयोग होने वाले फावड़े को तवा बना लिया। दो ईंट रखकर बनाए गए चूल्हे पर फावड़ा रखकर रोटी सेंक ली। कल्लू ने बताया कि गांव से आए दस दिन हो गए हैं। तब से इसी तरह अपनी जिंदगी बिता रहे हैं। इस बीच एक बार भी अपने घर नहीं गए।
बेटी के हाथ पीले करने की है जिम्मेदारी
नौधन पटना निवासी कल्लू के कंधों पर उसकी बेटी के हाथ पीले करने की जिम्मेदारी है। इसी को लेकर कल्लू काफी परेशान रहता है। उसका कहना था कि जब तक बिटिया के हाथ पीले नहीं हो जाते हैं, कितनी भी मेहनत करनी पड़े, करता रहूंगा। बता दें कि कल्लू के परिवार में एक बेटा, बेटी के अलावा पत्नी है।
100 दिन के रोजगार से नहीं भरता साल भर पेट
ग्रामीणों को रोजगार मिले इसको लेकर मनरेगा योजना की शुरूआत की गई लेकिन आज भी सैकड़ों ग्रामीण काम की तलाश में सैकड़ों किलोमीटर दूर आते-जाते हैं। ऐसे लोगों का कहना है कि 100 दिन के रोजगार से साल भर पेट नहीं भरता। इसी को लेकर घर परिवार से दूर रहकर मजदूरी करने जाना पड़ता है।