तिकुनिया। खीरी लोकसभा सीट का इतिहास काफी रोचक रहा है। यहां अंग्रेजों के समय में कई राजघराने थे। कई राजाओं का नाम आज भी चल रहा है। उनकी कोठियां और अन्य चीजें संरक्षित हैं। इन्हीं में एक सिंगाही स्टेट के राजा सूरथ बहादुर शाह थे। 1977 के दौर की बात करें तो जिले की सियासत राजा सूरथ बहादुर के दरबार से चलती थी।
47 साल पहले सिंगाही से राजा सूरथ बहादुर शाह सांसद तो जनसंघ पार्टी से रामचरन शाह विधायक थे। 75 वर्षीय बुजुर्ग नेता विशाल चंद्र शाह बताते हैं कि उस दौर में सिंगाही स्टेट सियासत का ऐसा केंद्र बिंदु था कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय का आना जाना रहता था। राजा सूरथ बहादुर के शाह भारतीय लोकदल के सांसद थे लेकिन उनके बुलावे पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सिंगाही आने से इन्कार नहीं कर पाए थे। 1980 में अटल बिहारी बाजपेयी सिंगाही आए थे।
1977 के लोकसभा चुनाव में राजा सूरथ बहादुर शाह भारतीय लोकदल, कांग्रेस से बाल गोविंद वर्मा और निर्दलीय चंद्र भाल आर्य चुनाव लड़े थे। सूरथ बहादुर शाह 173813 वोट लेकर विजयी हुए थे। कांग्रेस के उम्मीदवार बाल गोविंद वर्मा 99509 वोट लेकर दूसरे नंबर पर रहे थे। निर्दलीय चंद्र भाल आर्य को 12288 वोट मिले थे। 612725 वोटर थे। 957 बूथों पर मतदान हुआ था। 294415 मतदाताओं ने वोट डाला था। 48.1 प्रतिशत वोटिंग हुई थी। संवाद
बैलगाड़ी से करते थे चुनाव प्रचार, रात में लगती थी चौपाल
पुरानी चुनाव पद्धति के साथ राजनीतिक दलों के वोट मांगने की कला भी अनोखी थी। पहले दुर्गम मार्गों से बैलगाड़ियों पर बैठकर नेता वोट मांगने जाते थे। क्षेत्र के वयोवृद्ध तिकुनिया कस्बा निवासी भाजपा नेता विशाल चंद्र शाह बताते हैं कि उनके जमाने में चुनाव शांति एवं ईमानदारी से लड़ा जाता था। इतना विकास नहीं था। रास्ते नहीं थे। चलने के साधन नहीं थे। बैल गाड़ियों से चुनाव प्रचार के लिए जाना पड़ता था। वह दौर आंखों के सामने आज के परिदृश्य को देखते हुए चमक उठता है।
तब क्षेत्र में बने थे केवल तीन पोलिंग बूथ
वर्ष 1952 में चुनाव के दौरान मतदाताओं को वोट डालने के लिए केवल तीन बूथ बनाए गए थे। जिसमें मोतीपुर, बनवीरपुर, सिधौना में जाकर क्षेत्रीय मतदाताओं ने अपने-अपने वोट डाले थे। तिकुनिया कस्बे का वोट सिधौना में था, जहां तिकुनिया से शिवलाल गुप्ता तथा मामनचंद अग्रवाल बैलगाड़ी से मतदाताओं को सिधौना वोट डलवाने लेकर गए थे।
25 पैसे में बने थे जनसंघ पार्टी के सदस्य
भाजपा के बुजुर्ग नेता विशाल चंद्र शाह बताते हैं कि वर्ष 1961 में राजनीति में कदम रखा। सिंगाही स्टेट के निवासी रामचरन शाह वर्ष 1962 में जनसंघ पार्टी से चुनाव लड़े। तब संघ का चुनाव निशान जलता हुआ दीपक था। 25 पैसे देकर जनसंघ के सदस्य बने थे। उस समय कांग्रेस का चुनाव निशान दो बैलों की जोड़ी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का चुनाव निशान झोंपड़ी था। तीन ही पार्टियां थीं। पहले साधन नहीं थे। कार जीप का जमाना नहीं था। बहुत कम और सरकारी लोगों के पास ही यह साधन थे।