पुरातत्वविद् और इतिहासकारों ने जताई चिंता, बाेले-पुरातत्व विभाग को करना चाहिए स्थायी प्रबंध
जलभराव से संरचनाओं के स्वरूप में होगा परिवर्तन
संवाद न्यूज एजेंसी
पडरौना। कुशीनगर में खुदाई के बाद निकले पुरावशेष देश के इतिहास के लिए ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय इतिहास के लिए भी महत्वपूर्ण स्थल हैं। खुदाई के बाद इनका संरक्षण होना चाहिए न कि बर्बादी। लेकिन कुशीनगर में महापरिनिर्वाण मंदिर परिसर, माथा कुंवर मंदिर व रामाभार स्तूप में बरसात के मौसम में पानी भरा रहता है।
जिम्मेदार पुरातत्व विभाग संरक्षण नहीं कर पा रहा है और न ही प्रशासन इस बारे में कोई ठोस कदम उठा रहा है। इससे पुरातात्विक व पर्यटन दोनों दृष्टिकोण से नुकसान हो रहा है। इतिहासकार व पुरातत्वविद भी इन पुरावशेषों के खुदाई के बाद संरक्षण न होने को लेकर चिंता जता रहे हैं।
खुदाई के बाद बर्बादी क्यों
कुशीनगर पुरातात्विक स्थलों की खुदाई के बाद बर्बादी क्यों? इसका जिम्मेदार पुरातत्व विभाग यानी संस्कृति विभाग, भारत सरकार है। संरक्षण के बाद सुधार नहीं किया गया, जबकि पानी से लबालब भरने से पुरावशेष क्षतिग्रस्त होने के साथ स्वरूप परिवर्तित हो रहे हैं। इसका नुकसान पुरातत्व के साथ पर्यटन का भी है। अध्ययन व रिसर्चर्स को संरक्षण न किए जाने से दिक्कत होगी। यही हाल रहा तो धीरे-धीरे कुशीनगर के इन पुरातात्विक व ऐतिहासिक महत्व के स्थलों की छवि विश्व पटल से ओझल हो जाएगी।
-डाॅ. श्यामसुंदर सिंह, इतिहासकार एवं पुरातत्ववेत्ता
कुशीनगर के अवशेष बौद्धकालीन संस्कृति, सभ्यता व परंपराओं को समेटे हैं। जलमग्न होने से इनका अस्तित्व खत्म हो जाएगा। पुरातात्विक दृष्टिकोण से इनके बौद्धकालीन होने की ऐतिहासिकता भी समाप्त हो जाएगी। ये विश्व में भगवान बुद्ध से संबंधित पहले पुरावशेष हैं, जो कुशीनगर में खुदाई से मिले हैं। यह पूरी संपत्ति पुरातत्व विभाग की है। इसलिए यहां कोई दूसरा कुछ नहीं कर सकता। विभाग का अवशेषों के सुरक्षा व संरक्षण का दायित्व है, जिसका निर्वहन किया जाना चाहिए। संरक्षण न किया जाना, बेहद लापरवाही व निष्क्रियता का द्योतक है, जो गंभीर व चिंता का विषय है।
-पूर्व विभागाध्यक्ष गोरखनाथ, प्राचीन इतिहास पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोविवि
पुरातन हैं संरक्षण जरूरी
कुशीनगर में खुदाई से निकले अवशेष प्राचीन हैं। कोई भी पुरावशेष टीले में प्राकृतिक रूप से संरक्षित रहता है, लेकिन खुदाई के बाद संरक्षण की जरूरत होती है। कहा कि अवशेष जल भरे होने से उनकी बाइंडिंग क्षमता खत्म हो जाएगी। आने वाले कुछ समय में धीरे-धीरे नष्ट हो जाएंगे। कहा कि हड़प्पाकालीन कुआं राजस्थान के बनावली में है, जिसको पारदर्शी चादर से ढककर सुरक्षित किया गया है। यहां भी ऐसा किया जा सकता है। पुरातत्व विभाग की यह अनदेखी चिंतनीय है, जबकि स्मारक व धरोहरों को न छूने, न चढ़ने आदि की जागरूकता विभाग स्वयं स्मारकों के पास लिखवाए रखता है। ये अवशेष पुरातन हैं। इनका संरक्षण हर हाल में किया जाना चाहिए।
- डाॅ. वीरेंद्र कुमार, प्राचीन इतिहास पुरातत्व एवं संस्कृति विभागाध्यक्ष, बुद्ध पीजी कॉलेज, कुशीनगर
इंसर्ट
कुशीनगर त्रेता युग में भी था समृद्ध और विकसित
आज का कुशीनगर प्राचीन काल में मल्ल वंश की राजधानी थी। तब सोलह महाजनपदों में से एक था। चीनी यात्री ह्वेनसांग व फाह्नयान के यात्रा वृत्तांतों में इस प्राचीन नगर का उल्लेख है। महर्षि वाल्मीकि रामायण के अनुसार त्रेता युग में यह नगर विकसित और समृद्ध था। उस समय यह नगर भगवान राम के पुत्र कुश की राजधानी थी। इसलिए इसे कुशावती कहा जाता था। मल्लवंश के समय यह नगर कुशीनारा के नाम से ख्याति प्राप्त था। पांचवीं शताब्दी के अंत और छठवीं शताब्दी के प्रारंभ में भगवान बुद्ध का कुशीनगर आगमन हुआ था। यहां उन्होंने अपने शिष्य आनंद को अंतिम उपदेश देकर महापरिनिर्वाण प्राप्त किया।
1861 में हुई स्थापना
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना सन 1861 में हुई थी और यह पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत संस्कृति विभाग के संलग्न कार्यालय के रूप में कार्य करता है। इस विभाग के प्रमुख महानिदेशक होते हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रमुख कार्य
1-पुरातात्विक अवशेषों तथा उत्खनन कार्यों का सर्वेक्षण।
2-केंद्र सरकार की सुरक्षा वाले स्मारकों, स्थलों और अवशेषों का रखरखाव व परीक्षण।
3-स्मारकों और भग्नावशेषों का रासायनिक बचाव।
4-स्मारकों का पुरातात्विक सर्वेक्षण।
5-शिलालेख संबंधी अनुसंधान का विकास और मुद्रा शास्त्र का अध्ययन।
6-स्थल संग्रहालयों की स्थापना और पुनर्गठन।
7-विदेशों में अभियान।
8-पुरातत्व विज्ञान में प्रशिक्षण।
तकनीकी रिपोर्ट और अनुसंधान कार्यों का प्रकाशन।
मंडल और उपमंडलों से कर रहा संरक्षण
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अपने मंडलों और उप मंडलों के जरिए संरक्षण वाले स्मारकों का बचाव और संरक्षण करता है। प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल व अवशेष अधिनियम, 1958 के अंतर्गत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने देश में 3656 स्मारकों/स्थलों को राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया है, जिनमें 21 संपत्तियां यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं। एक सौ बासठ (162) वर्ष पहले हुई अपनी स्थापना के बाद से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण बहुत विशाल संगठन का आकार ले चुका है और समूचे देश में इसके कार्यालयों, शाखाओं और मंडलों का जाल फैला है।
1861-62 और 1911-1912 के बीच चला खुदाई कार्य
संस्कृति विभाग के अनुसार कुशीनगर में खुदाई का कार्य कनिंघम ने वर्ष 1861-62 में कराया था। उस दौरान यहां कोई संग्रहालय नहीं था। फिर बाद में 1911-12 के बीच पुरातत्ववेत्ता हीरानंद शास्त्री ने खुदाई कराई थी। हालांकि, विभाग के जिम्मेदार इन तथ्यों की अधिकारिक पुष्टि करने में असमर्थता जता रहे। कहा कि इसकी सही जानकारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सर्वे रिपोर्ट से ही चल पाएगी। वर्तमान में मौजूदा रिकॉर्ड के अनुसार कुशीनगर परिक्षेत्र में खुदाई से निकलीं कुछ कलाकृतियां राजकीय बौद्ध संग्रहालय में संरक्षित हैं। उनमें अलंकृत इष्टि का, शाल वृक्ष के नीचे शव पेटी व लेख, अभिलिखित शील, स्तूप व लेख युक्त मुहर, मनका, ध्यान मुद्रा में बुद्ध, तीन ईंटों से निर्मित प्रतिमा, भूस्पर्श मुद्रा में सिरविहीन बुद्ध, स्त्री की आकृति नुमा बर्तन, तीन स्तूप व बौद्ध मंत्र युक्त मुहर समेत अन्य कलाकृतियां प्रमुख रूप से शामिल हैं। लेकिन कनिंघम की ओर से कराईं गई खुदाई में निकली वस्तुएं कहां हैं। उसकी सही जानकारी नहीं है। बताया जाता है कि नेशनल म्यूजियम दिल्ली अथवा कोलकाता में संरक्षित होंगी।
कोट
कुशीनगर में बरसात में उत्खनित अवशेषों में पानी भरने का मामला गंभीर है। इस समस्या के समाधान के लिए उच्चस्तरीय विभागीय अधिकारियों को अवगत कराया जा चुका है। फिलहाल, इनमें बारिश का पानी न भरे और बचाव करने के लिए विद्युत मोटर से पानी निकालने का प्रबंध किया गया है। अभी इसके निजात के लिए कोई कार्य योजना नहीं है।
-अविनाश मोहंती, अधीक्षक पुरातत्व, सारनाथ मंडल, वाराणसी