पडरौना। इस्लाम में रमज़ान को बरकतों का महीना माना जाता है। रोजा रखने के दौरान खुद को साफ-सुथरा रहना जरूरी होता है। इस्लाम धर्म में साफ-सफाई का बहुत ध्यान रखा गया है। रमज़ान में बिना पाक-साफ हुए इबादत करने और बिना वजू के नमाज़ पढ़ने से मना किया गया है। रमज़ान में मुसलमान 30 दिन तक रोजा रखते हैं।
ये बातें मौलाना नूर हसन ने कहीं। उन्होंने कहा कि इस्लाम में पवित्रता की कितनी ज्यादा अहमियत है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस्लाम में ज्यादातर इबादतों और धार्मिक कार्यों को करने के लिए साफ-सफाई को लाजिम कर दिया गया है। इस्लाम में पाक-साफ हुए बगैर कोई भी इबादत अदा नहीं की जा सकती। अगर कोई व्यक्ति पवित्रता के बिना किसी काम को अंजाम देता है, तो इस्लाम के अनुसार उसकी दुआ खुदा के यहां कुबूल नहीं होती है। ऐसा आदमी नाफरमान साबित होगा व गुनाहगार माना जाएगा। उनके गुनाह की सजा कयामत में दी जाएगी। कुरान व हदीस में साफ-सफाई के चार दर्जे बताए गए हैं।
पहला दर्जा कपड़ों और बदन को गंदगी से दूर रखकर पाक साफ रहना है, ताकि नमाज़ व दूसरी इबादतें सही तरह से अदा हो सकें। दूसरा दर्जा हाथ, पांव, जुबान और आंखों को गुनाहों और गलत इस्तेमाल से बचाना है। दूसरों की बुराई झूठ, हरामखोरी, बेईमानी, गंदी चीजों को देखना और तमाम हराम कामों से अपने आपको बचाकर रखना। तीसरा दर्जा दिखावा और बुरे अखलाक व गंदी नियत को अपने दिल से निकालना। उसमें अच्छी आदतें तौबा, मुहब्बत, सब्र, शुक्र, खुदा का खौफ, और सच को अपने दिल में बसाना और चौथा दर्जा इस्लाम में सबसे ऊंचा दर्जा माना जाता है। दिल को अल्लाह के अलावा किसी दूसरे के ख्याल से पाक करना। जब तक दिल में कोई दूसरा ख्याल है, दिल अल्लाह के ख्याल में नहीं लग सकता।