पडरौना। प्रत्येक वर्ष मई के पहले मंगलवार को अस्थमा दिवस मनाया जाता है। इस बार यह दिवस विशेष ''जागरूकता और सशक्तीकरण'' की थीम पर मनाया जा रहा है। कुशीनगर के मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में हर दिन 15 से 20 अस्थमा के रोगी उपचार कराने पहुंच रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि माता-पिता से बच्चे को भी अस्थमा होने की आशंका रहती है। यह एक ऐसी बीमारी है, जो बच्चों से लेकर बुजुर्गों को भी अपनी गिरफ्त में लेती है। ऐसे में जागरूकता के बल पर इस बीमारी से बचाव संभव है।
मेडिकल कॉलेज के चेस्ट फिजीशियन डॉ. उपेंद्र चौधरी का कहना है कि हर दिन ओपीडी में 15 से 20 रोगी अस्थमा से पीड़ित उपचार कराने आते हैं। अस्थमा के कुछ सामान्य लक्षणों की बात करें तो सांस लेने में तकलीफ, खांसी, सांस लेते समय घरघराहट की आवाज आती है। ऐसी समस्या है तो अस्थमा की जांच जरूर करानी चाहिए। पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट (पीएफटी) से अस्थमा की सही जानकारी मिलती है। इसी आधार पर डॉक्टर अस्थमा को नियंत्रित करने का प्रयास शुरू करते हैं। उन्होंने बताया कि अस्थमा नियंत्रण में इनहेलर की भूमिका अहम है। डॉक्टर की सुझाव के बाद ही इनहेलर का प्रयोग करें। इनहेलर का प्रभाव किसी टेबलेट की तुलना में बेहतर भी साबित होता है। यह दो तरह का होता है, जिसमें पहला प्रिवेंट्स यानी रोग प्रतिरोधी, जिसे नियमित लेना होता है और दूसरा समस्या रोकने वाली दवाएं, जिसे लंबे समय तक लेना होगा। लोगों को अस्थमा से घबराने की बजाय समय से जांच कराने के साथ ही उपचार शुरू कर देना चाहिए। यह एक ऐसी बीमारी है, जो बच्चों से लेकर बुजुर्गों को भी अपनी चपेट में ले सकती है। जागरूकता के बल पर इससे निजात मिल सकती है।
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ये हैं अस्थमा के कारण :
मेडिकल साइंस में अस्थमा यानि दमा का कारण वंशानुगत भी माना गया है। अस्थमा मरीज के परिवार में पहले किसी को यह बीमारी रही है तो एक यह भी वर्तमान मरीज के लिए कारण हो सकता है। इसके अलावा धुएं व धूल के संपर्क में ज्यादा रहने, रूई, रेशे आदि के बीच काम करने, दमघोंटू माहौल में रहने या काम करने को मजबूर होना, ठंडे माहौल में ज्यादा रहना, ठंडे पेय एवं ठंडी वस्तुओं का सेवन करते रहना, धूम्रपान, प्रदूषण से भी अस्थमा पीड़ित हो सकते हैं।
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क्या है अस्थमा:
अस्थमा में सांस की नली सख्त या सिकुड़ जाती है और उसमें सूजन आ जाती है। इससे सांस लेते समय परेशानी महसूस होती है। सांस फूलने और खांसी (खासकर सूखी खांसी) की समस्या भी इसी कारण होती है। छाती में जकड़न महसूस हो सकती है और सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज आती है। धूल, धुएं से एलर्जी है तो समस्या बढ़ जाती है, वहीं संक्रमण जैसे-सर्दी, जुकाम होने पर अस्थमा की तकलीफ बढ़ जाती है।
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एलर्जी के कारणों का पता लगाकर होता है इलाज
फोटो है।
छाती एवं सांस रोग विशेषज्ञ डॉ. विकास गुप्ता ने बताया कि अस्थमा का इलाज डॉक्टर से कराएं। इलाज के साथ ही इसके बढ़ने के कारणों से बचें, तो ही फायदा हो सकता है। अस्थमा का इलाज फेफड़ों की जांच एवं एलर्जी के कारणों का पता लगाकर किया जाता है। रोगी को एलर्जी से मुक्त करने का उपचार किया जाता है। इससे भी अस्थमा में आराम मिलता है। अस्थमा को काबू में करने के लिए धूम्रपान न करें, अगर कोई कर रहा हो तो उससे दूर रहें। ठंड व ठंडे पेय लेने से बचे। थकान का काम न करें। ऐसा कोई काम न करें, जिससे सांस फूलने लगे। उन्होंने बताया कि अस्थमा रोगी को ऐसी दवाइयां दी जाती हैं, जो श्वसन क्रिया को आसान बनाती है। इनहेलर का प्रयोग आजकल अस्थमा रोग में किया जाता है। यह श्वसन तंत्र की सूजन को कम करता है और इससे मरीज को तत्काल राहत मिलती है। अगर परिवार में किसी को परेशानी हो रही है तो अस्थमा की जांच करा लेनी चाहिए। माता-पिता से भी बच्चे को अस्थमा होने की आशंका बनी रहती है।
रोडवेज बस स्टैंड परिसर में लगी पानी की टंकी टूटी पड़ी टोटी । संवाद
रोडवेज बस स्टैंड परिसर में लगी पानी की टंकी टूटी पड़ी टोटी । संवाद
रोडवेज बस स्टैंड परिसर में लगी पानी की टंकी टूटी पड़ी टोटी । संवाद
रोडवेज बस स्टैंड परिसर में लगी पानी की टंकी टूटी पड़ी टोटी । संवाद