- पराली जलाने के मामले में कसया तहसील में सात किसानों पर हो चुकी है जुर्माने की कार्रवाई
पडरौना। पराली जलाने पर रोक लगी है। इसके बाद भी लोग खुलेआम पराली जला रहे हैं। शनिवार को पराली जलाने के सात मामले सामने आए। इनमें हाटा में पांच और पडरौना में दो जगह जलाने की सूचना मिली। इस सूचना का सत्यापन कृषि विभाग कराने में जुटा है। पूरे एक साल में पराली जलाने के 29 मामले सामने आए। इनमें कसया तहसील के सात किसानों पर जुर्माना भी लगाया जा चुका है। पराली जलाने के कारण प्रदूषण में भी बढ़ोत्तरी हो रही है।
पिछले एक सप्ताह में हवा की गुणवत्ता के सूचकांक (एक्यूआई) में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। शनिवार को एक्यूआई 108 दर्ज की गई थी। वहीं, रविवार को यह बढ़कर 212 पहुंच गई। दिवाली के अगले दिन सोमवार को एक्यूआई 163, मंगलवार को 204 बुधवार को बढ़कर 247 पर पहुंच गया था। घटता-बढ़ता एक्यूआई लोगों की सेहत को खराब कर रहा है।
एक साल में 29 घटनाएं आई सामने
कृषि विभाग की मानें तो शनिवार को जिले में पराली जलाने की कुल सात घटनाएं सामने आई थी। इसमें से हाटा तहसील में पांच और पडरौना क्षेत्र में दो जगहों पर पराली जलाने की घटना हुई। इनका सत्यापन कराया जा रहा है। डीडी कृषि आशीष कुमार ने बताया कि जिले में पराली जलाने की अब तक कुल 29 घटनाएं सामने आई हैं। सत्यापन के बाद दो घटनाएं पड़ोसी जनपद की मिलीं, जबकि पांच घाटनाएं झूठी मिली। इसमें कुल 18 घटनाएं पराली जलाने की सत्यापित हुई हैं। इसमें कसया के सात किसानों पर 2500 रुपये का जुर्माने की कार्रवाई की गई है। शेष का सत्यापन कराया जा रहा है। यदि पराली जलाने की पुष्टि हुई तो संबांधित के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। अधिकांश किसान शाम को ही पराली जलाते हैं। इसके चलते सुबह के समय जिले की एक्यूआई बढ़ जाती है।
पराली जलाने पर इन गैसों का होता है उत्सर्जन
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. आशोक राय ने बताया कि पराली जलाने से मीथेन, कार्बन मोनो ऑक्साइड, कार्बनडाइ ऑक्साइड, पार्टिकुलेट मैटर आदि गैसों का उत्सर्जन होता है। इससे वायुमंडल में धुंध छा जाता है। इससे पर्यावरण और मनुष्य के लिए बेहद खतरनाक हैं।
पराली के धुएं से बीमारियों के होने का डर
पेट एवं लीवर रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण कुमार राव ने बताया कि पराली के धुएं से फेफड़े की समस्या, सांस लेने में तकलीफ, कैंसर समेत अन्य रोग, दिल के मरीजों को समस्या, आंखों में जलन, एलर्जीक अस्थमा और सीओपीडी के अलावा हाईपर टेंशन बढ़ जाता है।
मिट्टी की उर्वरा क्षमता होती है कम
भूमि संरक्षण अधिकारी डॉ. बीआर मौर्या ने बताया कि पराली जलाने से राख पैदा होती है। जिस स्थान पर पराली जलाई जाती है, उस जगह पर पाई जाने वाले सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं। इससे फसलों की पैदावार कम हो जाती है और मिट्टी की गुणवत्ता या उर्वरा क्षमता कम होती है।
यह है कानून
डीडी कृषि आशीष कुमार ने बताया कि एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) ने दस दिसंबर 2015 को फसल अवशेषों पर जलाने का प्रतिबंध लगा दिया है। पराली जलाने पर कानूनी तौर पर कार्रवाई भी की जाती है। पराली जलाने के दोषी पाने पर दो एकड़ भूमि तक 2,500 रुपये, दो से पांच एकड़ भूमि तक 5,000 रुपये और पांच एकड़ से ज्यादा भूमि पर 15,000 रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है।
सख्ती के बाद भी खेतों में जलाई जा रही पराली
सुकरौली। शासन की सख्ती के बावजूद किसान खेतों में पराली जला रहे हैं। शिकायत करने के बाद भी पुलिस प्रशासन कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है। पराली से उठ रहा धुआं बीमार लोगों के लिए खतरा बना हुआ है।सुकरौली, बढ़यां बुजुर्ग, पड़री, बंचरा, महादनपुर सिहुलियां, पिडरा, भीष्वा मठवालगिरी आदि गांव में कंबाइन से कटे धान की फसल का अवशेष जला रहे हैं। इसके चलते शाम होते ही आस-पास के खेतों में धुएं का गुबार फैल जा रहा है।