पडरौना चीनी मिल पर किसानों और कर्मचारियों के बकाया देयों के भुगतान के लिए पहले तो इसे चलाने का प्रयास हुआ, लेकिन खरीदार नहीं आए तो नीलामी की प्रक्रिया शुरू हुई। कई मर्तबा नीलामी की तारीखें पड़ीं, लेकिन उसके लिए खरीदार नहीं मिले। इस वजह से चीनी मिल जस की तस हालत में पड़ी है।
कम दाम पर ही चीनी मिल बेचने का अमर उजाला ने किया था भंडाफोड़
वर्ष 2018 में इस चीनी मिल की नीलामी मात्र 61 लाख 57 हजार रुपये में करने की पृष्ठभूमि तैयार कर ली गई। एक फर्जी फर्म के नाम से 61.57 करोड़ रुपये में तहसील में गुपचुप तरीके से कुछ गिने-चुने लोगों की मौजूदगी में नीलामी की जा रही थी। अमर उजाला ने इस फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ किया। उसके बाद इस चीनी मिल की चल-अचल संपत्ति का मूल्यांकन कराने का आदेश हुआ। पूरी संपत्ति का राजस्वकर्मियों को लगाकर मूल्यांकन हुआ तो इसकी कुल संपत्ति की कीमत 02 अरब तक पहुंच गई थी। चीनी मिल के बदले उतनी अधिक धनराशि दे पाने के लिए कोई खरीदार अब तक नहीं मिला।
बकाया न मिलने के कारण कर्मचारियों ने ले ली कोर्ट की शरण
बताया जाता है कि पडरौना चीनी मिल पर बकाया देयों का भुगतान न होने से मायूस कर्मचारियों ने उच्च न्यायालय की शरण ले ली है। इस चीनी मिल का मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। हालांकि, वर्ष 2014 में लोक सभा चुनाव के पहले जनपद मुख्यालय के पास चुनावी जनसभा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मिल को चलवाने की घोषणा भी की थी, लेकिन अब तक वह वादा पूरा नहीं हो सका।
चीनी मिल के एक वरिष्ठ कर्मचारी बताते हैं कि पडरौना चीनी मिल को चलवाने के लिए वर्ष 2003 में वृहद आंदोलन हुआ था। काफी संख्या में किसानों और कर्मचारियों ने आंदोलन किया था। आंदोलनकारियों की पुलिस और प्रशासन से तीखी नोकझोंक हुई थी। पुलिस ने लाठीचार्ज किया था। हवाई फायरिंग भी हुई थी। इसमें भुलन नाम के एक युवक की जान चली गई थी।
किसान बोले
पडरौना चीनी मिल चल रही थी तो हमारा गन्ना वहीं जाता था। इस चीनी मिल पर वर्ष 1996-97 का सात ट्राॅली गन्ना गिराए थे, लेकिन चीनी मिल बंद हो गई। चीनी मिल न चलने के कारण पर्ची का भी ध्यान नहीं रहा। वह भी गुम हो गई। अब तो उम्मीद ही नहीं कि इस चीनी मिल को बेचे गए गन्ना का भुगतान भी हो पाएगा। -अनिल उपाध्याय, बलोचहां, प्रगतिशील किसान।
पडरौना चीनी मिल पर मेरा दस लाख रुपये से अधिक वेतन और डेढ़ लाख से अधिक ग्रेच्युटी बाकी है। पहले इस चीनी मिल में डेढ़ हजार कर्मचारी और मजदूर थे। बाद में जेएचवी शुगर मिल ने कम लोगों की आवश्यकता बताकर अपनी शर्तों पर करीब 500 लोगों को वीआरएस दे दिया, तब भी एक हजार के आस-पास कर्मचारी एवं मजदूर रह गए थे। चीनी मिल के बंद हो जाने से उन सभी के आय का स्रोत बंद हो गया। तब से बकाए की आस में हैं, लेकिन उम्मीद कम दिख रही है। बड़ी मुश्किल से परिवार का गुजर-बसर होता है। -अशोक कुमार अग्रवाल, चीनी मिल के तत्कालीन वरिष्ठ लेखाधिकारी।
पडरौना चीनी मिल पर पेराई सत्र 1996-97 का 10.57 करोड़ और 2011-12 का तीन करोड़ पांच लाख रुपये बाकी है। चीनी मिल का मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। चीनी मिल की नीलामी कर बकाया देयों के भुगतान की प्रक्रिया गन्ना एवं राजस्व विभाग की तरफ से कई बार अपनाई गई, लेकिन खरीदार नहीं मिले। -दिलीप कुमार सैनी, जिला गन्ना अधिकारी।
यह कपड़ा मंत्रालय की चीनी मिल है। पडरौना चीनी मिल का मसला हमने सदन में उठाया था। उस समय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी ने बताया था कि चीनी मिल पर बकाया देयों को लेकर कई मुकदमे हैं। जब तक ये मुकदमे निस्तारित नहीं हो जाते, तब तक मिल चलवा पाना संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि इस चीनी मिल पर कुछ ऐसे लोगों ने मुकदमे कर दिए, जिनका खुद कोई बकाया नहीं है। इस वजह से चीनी मिल के बारे में सरकार कोई निर्णय नहीं ले पा रही है और वास्तविक किसान व कर्मचारी परेशान हो रहे हैं। -विजय कुमार दुबे, सांसद, कुशीनगर।