शिया और सुन्नी दोनों समुदायों के लोग मनाते हैं मोहर्रम
संवाद न्यूज एजेंसी
गंगुआ बाजार। मोहर्रम का महीना मुसलमानों के लिए गम का महीना होता है। मुसलमानों में शिया व सुन्नी दोनों समुदायों के लोग हजरते इमाम हुसैन की शहादत को याद कर अपने रिवाज के अनुसार मातम मनाते हैं। सुन्नी समुदाय के लोग ढोलक की थाप पर लाठी-डंडे व तलवार आदि से कला का प्रदर्शन करते हैं। हालांकि, उलमा लोगों को ढोलक नहीं बजाने की हिदायत देते रहते हैं।
आज से करीब चौदह सौ साल पहले पैगंबर हजरत मुहम्मद के नवासे हजरते इमाम हुसैन को इराक के कर्बला में अपने 72 साथियों के साथ शहादत मिली। हजरते इमाम हुसैन की इस शहादत को याद कर मुस्लिम समुदाय के लोग मोहर्रम के महीने में मातम मनाते हैं।
क्षेत्र के गंगुआ मठिया, सरेया बुजुर्ग, लक्ष्मीपुर बुजुर्ग, परसौनी खुर्द, बिहार बुजुर्ग, मंगुरीपट्टी, गगलवा आदि गांवों में मोहर्रम की तैयारियां जोरों पर हैं। इस दौरान इन गांवों के युवा व किशोर बच्चे लाठी-डंडा खेलकर कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। कहीं-कहीं लोग ढोलक की थाप पर करतब भी दिखाते हैं।
मौलाना आलमगीर जिन्नाती बताते हैं कि मोहर्रम का त्योहार मातम का होता है। इसलिए ढोल आदि बजाने से सबको परहेज करना चाहिए। ऐसा धार्मिक किताबों में है। उलमा ने बताया कि किताबों में लाठी, डंडा, तलवार आदि से कला या करतब दिखाने की कोई मनाही नहीं है।