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Kushinagar News: खड्डा, विशुनपुरा, पडरौना और तमकुहीराज ब्लॉक में फैली लंपी

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पिपरा घाट गांव में रोग से पीड़ित पशु ।संवाद
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प्रकोप बढ़ा तो जागा पशुपालन विभाग, टीकाकरण शुरू, पशुपालकों में बढ़ी चिंता, लंपी वाले पशुओं को किया गया क्वारंटीन
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संवाद न्यूज एजेंसी
पडरौना। कुशीनगर जिले में लंपी बीमारी का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। समय से पशुपालन विभाग ने पशुओं को लंपी का टीका लगाया होता तो शायद इस बीमारी की चपेट में पशु नहीं आते। खड्डा, विशुनपुरा और तमकुहीराज में इसका प्रकोप ज्यादा है। गांवों में इलाज के लिए पहुंच रही पशुपालन विभाग की टीम पशुपालकों को बचाव का तरीका बता रही है। इस बीमारी की चपेट में आए पशुओं को क्वारंटीन किया गया है।
लंपी बीमारी का प्रकोप बढ़ने पर पशुपालन विभाग की नींद खुली। दस हजार पशुओं को लगाने के लिए लंपी का टीका आया था। वह भी लापरवाही की वजह से नहीं लग पाया था। दस दिनों से सक्रिय हुआ विभाग टीकाकरण शुरू कराया है। 50 हजार और लंपी का टीका जिले को मिला है। अभी तक दस हजार से अधिक पशुओं को टीका लगाया जा चुका है। मंगलवार को तमकुहीराज के लतवाजीत गांव निवासी लल्लन कुशवाहा और सरेया गांव निवासी बसंत गोंड की गाय लंपी की चपेट में आ गई हैं। पशु पालकों का आरोप है कि सूचना कि बाद भी पशु चिकित्सक नहीं आ रहे हैं, प्राइवेट डॉक्टर से इलाज मजबूरी में कराना पड़ रहा है। गांव के अन्य पशु पालकों में भी चिंता बढ़ गई है। बीमारी की चपेट में आई गायों को क्वारंटीन किया गया है। खड्डा ब्लॉक के हनुमानगंज गांव के पड़रहवा टोला समेत तीन गांव में लंपी की चपेट में कई पशु आए हैं। इसके अलावा विशुनपुरा ब्लॉक के सीरिसिया दीक्षित समेत दो गांव, पडरौना ब्लॉक के एक गांव में लंपी का कहर है। पशु पालन विभाग की माने तो अभी तक जिले में करीब 20 पशु ऐसे मिले हैं, जिनमें लंपी डिजीज के लक्षण हैं। पशुपालन विभाग के सभी पशुपालकों को गांवों में जाने और पशु पालकों को जागरूक करने का निर्देश दिया गया है।
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क्या है लंपी बीमारी
लंपी एक त्वचा रोग है, जो गाय, भैंस में तेजी से फैलता है। यह विषाणु जनित संक्रामक रोग है। इसलिए बेहद खतरनाक होने के साथ इलाज में भी देरी होती है। एक पशु से दूसरे पशु में फैलता है।

लंपी रोग के लक्षण
लंपी वायरस से संक्रमित पशु को हलका बुखार रहता है, मुंह से लार अधिक निकलती है और आंख-नाक से पानी बहता है। पशुओं के लिंफ नोड्स और पैरों में सूजन रहती है। संक्रमित पशु के दूध उत्पादन में गिरावट आ जाती है। गर्भित पशु में गर्भपात का खतरा रहता है और कभी-कभी पशु की मौत भी हो सकती है। पशु के शरीर पर त्वचा में बड़ी संख्या में दो से पांच सेमी आकार की कठोर गांठें बन जाती हैं।
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लंपी से बचाव के लिए क्या करें उपाय
जो पशु संक्रमित हों, उसे स्वस्थ पशुओं से अलग रखें, ताकि संक्रमण न फैले। कीटनाशक और विषाणुनाशक से पशुओं के परजीवी कीट, कीलनी, मच्छचर और मक्खी से और दूषित जल, दूषित भोजन और लार के संपर्क में आने से यह रोग अन्य पशुओं में फैल सकता है। पशुओं के बाड़ों की सफाई रखें, लंपी के लक्षण दिखने पर पशु चिकित्सक से संपर्क करें। स्वस्थ पशुओं का टीकाकरण कराना चाहिए, ताकि अगली बार उन्हें किसी तरह का संक्रमण न हो।
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वर्जन
-जिन गांवों में लंपी बीमारी से पशु प्रभावित हैं, वहां के पशुपालकों को जागरूक किया जा रहा है। इलाज के साथ सतर्कता जरूरी है। दो साल पूर्व जिले में लंपी का टीका लगा था। दस हजार टीका आया था, लेकिन बीमारी बढने पर 50 हजार और मंगाया गया है। गलाघोटू और लंपी का टीकाकरण एक साथ कराया जा रहा है। लंपी की चपेट में आने वाले पशुओं को क्वारंटीन कराया जा रहा है। दो साल पहले लंपी डिजिज का टीका पशुओं को लगाया गया था। अभी जो पशु इसकी चपेट में आए हैं, उनमें ज्यादातर बाहर से खरीदकर लाए गए हैं।
डॉ. रवींद्र प्रसाद, मुख्य पशुचिकित्साधिकारी
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