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Kushinagar News: बिना पंजीकरण या गोरखपुर और लखनऊ के नामी डॉक्टरों के नाम अस्पताल खोल कर रहे इलाज

Fri, 23 Jun 2023 12:15 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
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12 अप्रैल को कप्तानगंज के आयुष्मान हॉस्पिटल को सील करते एसडीएम मोहम्मद जफर और प्रभारी चिकित्सा
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मरीजों की मौत पर हंगामा होने के बाद जांच में बिना पंजीकरण संचालित होते मिलते हैं अधिकतर अस्पताल
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अस्पताल बंद कर संचालक और चिकित्सकीय स्टाफ हो जाते हैं गायब


संवाद न्यूज एजेंसी

कुशीनगर। जिले में कई ऐसे अस्पताल संचालित हो रहे हैं जो बिना पंजीकरण और गोरखपुर, लखनऊ और दिल्ली के नामी डॉक्टरों के बोर्ड लगाकर इलाज कर रहे हैं। लेकिन वहां कोई विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं होता। कम डिग्री वाले लोग इलाज करते हैं। मरीज की हालत बिगड़ने या मौत पर हंगामा होने के बाद लोगों को पता चलता है। स्वास्थ्य विभाग आनन-फानन पहुंचता है, लेकिन केवल अस्पताल को सीलकर खानापूर्ति कर ली जाती है। जनपद में 193 अस्पताल ही पंजीकृत हैं, लेकिन 500 से अधिक अस्पताल संचालित हो रहे हैं।
जिले में सैकड़ों मुन्ना भाई अस्पताल अपने जुगाड़ तंत्र से चला रहे हैं, जिनमें डॉक्टर अस्पताल में हैं ही नहीं और उनके नाम पर रजिस्ट्रेशन है। ये डॉक्टर किसी और शहर में प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं और अपने नाम से रजिस्ट्रेशन के एवज में हर माह मुन्ना भाई से कमीशन लेते हैं। कई अस्पताल तो बिना पंजीकरण के ही चल रहे हैं। मुन्ना भाई और एमबीबीएस डॉक्टरों का गठजोड़ फल-फूल रहा है। ऐसे डॉक्टर मोटी कमाई के फेर में इस गठजोड़ का हिस्सा हैं। खड्डा, तमकुहीराज, पडरौना, हाटा सहित विभिन्न तहसील क्षेत्रों में ऐसे अस्पताल संचालित हो रहे हैं।
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कमीशन के खेल में सिस्टम फेल

इस खेल के अहम किरदार एंबुलेंस चालक भी बताए जाते हैं। अस्पताल में इलाज के लिए लाने पर मुन्ना भाई ने उनका कमीशन तय कर रखा है। एंबुलेंस चालक को मरीज के हिसाब से रुपये मिलते हैं। गंभीर सर्जरी वाले मरीजों का रेट सबसे अधिक है। ऐसे मरीज लाने पर एंबुलेंस चालकों को उनका हिस्सा दे दिया जाता है। इसके लिए एंबुलेंस चालक सीमावर्ती बिहार व जनपद के विभिन्न हिस्सों से मरीज लेकर पहुंचते हैं। ये एंबुलेंस चालक सरकारी अस्पतालों के आसपास अपने वाहन खड़े किए रहते हैं।


स्वास्थ्यकर्मियों का भी रहता है गठजोड़

निजी अस्पतालों में मरीजों को ले जाने में पूर्व में कई बार स्वास्थ्यकर्मियों का नाम भी आ चुका है। आशा, एएनएम और स्टाफ नर्स कमीशन की चाहत में मरीजों को सरकारी अस्पताल में न ले जाकर निजी अस्पतालों में पहुंचा देती हैं, जहां उनका कमीशन तय होता है। सुविधाएं सरकार से लेती हैं और कमीशन निजी अस्प्तालों से। इस तरह के ज्यादातर मामले प्रसव से संबंधित होते हैं।


शपथपत्र देने का है नियम
अस्पताल के पंजीकरण के दौरान जिस डॉक्टर का नाम रहता है, वह शपथपत्र देता है। शपथपत्र में इस बात का जिक्र रहता है कि वह अस्पताल में बैठेगा और मरीजों का इलाज करेगा। इसके अलावा इमरजेंसी में किसी भी समय इलाज के लिए उपलब्ध रहेगा, लेकिन शपथ पत्र देने के बाद भी बड़ी संख्या में डॉक्टर अपने नाम से पंजीकृत अस्पतालों में नहीं बैठ रहे हैं।



हाटा तहसील क्षेत्र में संचालित इन अस्पतालों में हुई कार्रवाई

-सुकरौली क्षेत्र के तीतिला में अनुष्का हॉस्पिटल के खिलाफ ऑपरेशन के दौरान लापरवाही बरतने की शिकायत पर 14 जून 2022 को हाटा कोतवाली में केस दर्ज हुआ था। शिकायत को संज्ञान लेकर तत्कालीन डीएम एस. राजलिंगम के निर्देश पर पहुंची स्वास्थ्य टीम ने डिप्टी सीएमओ डॉ. एएन ठाकुर और स्थानीय प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. स्वप्निल श्रीवास्तव आदि की मौजूदगी में अस्पताल की ओटी, मेडिकल स्टोर तथा वार्ड को सील कर दिया था। इस समय एक मरीज भर्ती थी, जिसका प्रसव हुआ था। पूरी कार्रवाई के दौरान अस्पताल में कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था।
- जुलाई 2022 में अहिरौली बाजार थाना क्षेत्र के मझना नाला पुल चौराहे पर संचालित ममता हॉस्पिटल को हाटा के एसडीएम वरुण पांडेय और स्वास्थ्य विभाग के प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. स्वप्निल श्रीवास्तव ने जांच की थी। जांच में अस्पताल बगैर मान्यता के अवैध रूप से संचालित मिला। अस्पताल का संचालन झोलाछाप बगैर डिग्रीधारक व्यक्ति करता मिला। अस्पताल के दवा कक्ष में बगैर लाइसेंस के भारी मात्रा में दवाएं मिलीं। अस्पताल के ऑपरेशन थियेटर में ऑक्सीजन सिलिंडर सहित अन्य उपकरण मिले थे। ऑपरेशन थियेटर में गंदगी का अंबार पड़ा मिला। अस्पताल को सील कर दिया गया था। एसडीएम ने एमओआईसी को अस्पताल संचालक के विरुद्ध केस दर्ज कराने के निर्देश दिए थे।



-हाटा नगर में संचालित करीब एक माह पहले स्वास्थ्य विभाग की टीम ने यश हॉस्पिटल, गोल्ड हॉस्पिटल और साईं हॉस्पिटल को डॉक्टर नहीं होने की वजह से सील कर दिया था।





डिग्रीधारक डॉक्टरों के बोर्ड लगाकर इलाज करते हैं मुन्ना भाई

दुदही क्षेत्र में डिग्रीधारक डॉक्टरों के बोर्ड लगाकर मुन्ना भाई इलाज करते हैं। कम पढ़े-लिखे और सुविधाविहीन ये लोग बोर्ड पढ़कर ही इन अस्पतालों के चक्कर में पड़ जा रहे हैं। फलस्वरूप उन्हें रुपये के साथ अपने प्रियजन को भी खोना पड़ रहा है। इस तरह के अस्पतालों में पिछले आठ सालों में 20 से अधिक महिलाओं की जान जा चुकी है, लेकिन बहुरुपिए कार्रवाई से बच जाते हैं।



4 मार्च 2021 को विशुनपुर बरिया पट्टी गांव की कुसुम देवी पत्नी बुधई के पेट में दर्द हुआ। गांव की आशा उसे सीएचसी ले जाने के बजाय दुदही टैक्सी स्टैंड के एक निजी अस्पताल पर ले गई। वहां डॉक्टर गंभीर बीमारी बताकर बच्चेदानी का ऑपरेशन करने लगे। ऑपरेशन के दौरान महिला की मौत हो गई। उसके बाद सभी अस्पताल कर्मी भाग निकले। हंगामा और धरना के बाद पुलिस पहुंची। शव कब्जे में लेकर कार्रवाई में जुट गई। मृतका के दामाद रमानंद गुप्ता ने अस्पताल के स्वास्थ्यकर्मियों पर केस दर्ज कराया था।



अप्रैल में सील हुआ था अस्पताल

6 अप्रैल 2023 को खुशी अस्पताल पहुंचे एसीएमओ आरडी कुशवाहा ने टीम के साथ जांच की। अस्पताल में चार मरीज़ भर्ती थे, लेकिन मौके पर कोई चिकित्सक नहीं मिला। एसीएमओ ने भर्ती मरीजों को दूसरे अस्पताल में भर्ती कराकर अस्पताल को सील करा दिया।



इससे पहले 7 मार्च 2023 को नंदन छपरा की मंजू देवी और उसके बच्चे की मौत के बाद परिवार के लोगों ने साईं अस्पताल पर लापरवाही के चलते मौत होने का आरोप लगाया था। पिता की तहरीर पर अज्ञात चिकित्सक पर मुकदमा दर्ज कर छोड़ दिया गया था।

12 मई 2023 को महराजगंज की पुष्पा देवी की मौत भी ऑपरेशन के बाद हो जाने पर परिजन शव रखकर रास्ता जाम किए थे। उसके बाद साईं अस्पताल सील हुआ था।





निजी अस्पतालों की भरमार, पंजीकृत गिने-चुने



कप्तानगंज तहलील क्षेत्र में भी निजी अस्पतालों की भरमार है, लेकिन पंजीकृत सिर्फ 20 ही हैं। ये अस्पताल जिन डॉक्टरों के नाम पर हैं, उनकी मौजूदगी नहीं रहती है। लेकिन उनकी डिग्री की आड़ में मरीजाें का धड़ल्ले से इलाज होता है।

अभी इसी महीने 6 जून को कप्तानगंज कस्बे के पल्स हॉस्पिटल को एसडीएम और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने सील किया था। वहां न तो कोई डाॅक्टर था और न ही पंजीकरण हुआ था। जांच की भनक मिलते ही मौके से सभी स्वास्थ्यकर्मी भाग खड़े हुए थे। ये चंद मामले तो उदाहरण मात्र हैं, जिले में ऐसे अस्पतालों में कई घटनाएं हो चुकी हैं, जहां मरीजों की मौत के बाद हंगामा होने पर अस्पताल के जिम्मेदार और स्वास्थ्यकर्मी भाग निकले। स्वास्थ्य महकमे के अफसरों ने वहां पहुंचकर अस्पताल सील कराकर खानापूर्ति कर ली।
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वर्जन-

अवैध अस्पतालों को चिह्नित कर उनकी जांच करने और कार्रवाई के लिए टीम बनी हुई है, जो समय समय पर अस्पतालों की जांच करती है। इसके अलावा जिन अस्पतालों के बारे में शिकायतें आती हैं, उनकी भी जांच कर कार्रवाई की जाती है। पूर्व में कई अवैध अस्पतालों पर कार्रवाई की जा चुकी है।

-डॉ. सुरेश पटारिया, सीएमओ
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