तुर्कपट्टी। सांस्कृतिक भड़ैती, फूहड़पन के विरुद्ध जनसंस्कृति के सम्वर्द्धन की आवाज बना जोगिया जनूबी पट्टी का लोकरंग इस बार देश के वर्तमान हालात को रेखांकित कर रहा है। काफी दिनों से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहे राजनैतिक, शैक्षिक और सामाजिक मुद्दे भित्ति चित्रों के माध्यम से दर्शाए गए हैं।
उच्च स्तरीय शिक्षण संस्थानों के अत्यधिक शुल्क, महंगी किताब कापियों और विभिन्न स्तरों पर हो रही धनउगाही के मकड़जाल में फंसे विद्यार्थी और मध्यमवर्गीय अभिभावकों के मनोदशा को शब्द देता संभावना कला मंच गाजीपुर के कलाकारों का भित्ति चित्र खासा चर्चा का विषय बना हुआ है। लोकरंग के मंच की तरफ बढ़ते दर्शकों के कदम तब बरबस ही ठहर जाते हैं, जब एक कोने में मिट्टी के अनेक मटकों के माध्यम से जातिवाद, नस्लवाद, अधर्म, दहेज, छुआछूत, रंगभेद, हिंसा आदि को श्रद्धांजलि देने का प्रयास किया गया है। खेती की बढ़ती लागत और छुट्टा जानवरों से फसलों को हो रहे नुकसान से आहत किसानों के दर्द को बयां करता विजुका का भित्तिचित्र भी लोगों के कौतूहल का विषय बना रहा।
मजबूत न्यायपालिका ही एक लोकतांत्रिक देश की तरक्की तथा विभिन्न समस्याओं के समाधान का एकमात्र विकल्प है। एक दीवार पर बना यह चित्र लोगों को गर्व करने की एक बड़ी वजह दे रहा था।
लोकरंग में अनावश्यक पानी के दोहन से भविष्य में पानी की किल्लत से खड़ी होने वाली समस्या के साथ-साथ महिलाओं की सफलता और असफलता को भी दर्शाने का सफल प्रयास किया गया है। विलुप्त हो रही लोकसंस्कृति की चिंता का सबब बना लोकरंग विभिन्न आयोजनों में पानी की तरह बहाए जा रहे रुपये, विवाह तथा अन्य मांगलिक अवसरों पर समाप्त हो रहे डोली, कहार, लोकगायन आदि विषयों पर भी अपनी कुंची चलाने का सार्थक और सफल प्रयास किया है।
इस संबंध में संभावना कला मंच के राजीव गुप्ता, सुधीर सिंह, उत्कर्ष सिंह, नूपुर वर्मा आदि ने बताया कि लोकरंग हमेशा से सामाजिक सरोकारों को अपने विमर्श का विषय बनाया है। भित्तिचित्रों के रंग भी उन्हीं भावनाओं का हिस्सा है। देशकाल की स्थितियों और परिस्थितियों को रंग देना ही हम कलाकारों को धर्म है।