जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक की भूमिका निभा सकते हैं। फिलहाल मुस्लिम मतदाता खामोश है। चाय-पान की दुकान से लेकर घरों में लगने वाली चौपाल में अभी यही तय नहीं हो पाया है कि वह किसके साथ जाएं। बसपा के साथ खड़े हों या फिर सपा-कांग्रेस गठबंधन के झंडाबरदार बने। मुस्लिम मतदाता अभी पसोपेश में है। इससे प्रत्याशियों की चिंता बढ़ गई है। प्रत्याशी इनको अपने पाले में लाने के लिए घरों में दस्तक दे रहे हैं, लेकिन इनकी चुप्पी नहीं टूट रही है।
पर्याप्त संख्या बल होने के कारण भी मुस्लिम मतदाता फिलहाल शांत है। न किसी के लिए वह उत्साह दिखा रहे हैं, न ही किसी के लिए अपनी स्थिति स्पष्ट कर रहे हैं। बसपा ने दलित-मुस्लिम गठजोड़ के तहत मैदान मारने की रणनीति बनाई है। वहीं सपा कांग्रेस का गठबंधन होने से मुस्लिमों की निगाह इस ओर भी है। मुस्लिम जिस ओर एकला चलेगा, चुनाव की दशा और दिशा उस ओर बदलने की संभावना है। यही कारण है कि स्थानीय मुस्लिम नेता राजनीतिक दलों के साथ तो हो गए हैं, लेकिन मतदाताओं को वह अपने साथ नहीं जोड़ पा रहे हैं। मतदाताओं में बिखराव है, इससे सपा-कांग्रेस व बसपा के प्रत्याशियों की परेशानी बढ़ गई है। सिराथू और चायल सीट का रुख ही नहीं लोग भांप पा रहे हैं। चुनाव के आखिरी दौर में घरों के भीतर, मोहल्लों में चौपाल लगनी जरूर शुरू हो गई है।
चाय-पान की दुकानों में इस पर बहस तेज हो गई है कि आखिर किस सीट पर कौन भारी है। प्रत्याशी की क्या रणनीति है। मुस्लिम मतदाता चुनाव में अपना वोट खराब करना नहीं चाहता है। वह ठोस निर्णय लेना चाहता है। इसलिए चुनावी तस्वीर अभी धुंधली है। अब प्रत्याशियों में इस समुदाय का दिल जीतने की रस्साकशी शुरू हो गई है। मुस्लिम मतों की ही वजह से चुनाव त्रिकोणीय हो सकता है।