दोआबा में गांजे का कारोबार भांग की दुकानों के अलावा गांव-गांव में हो रहा है। इसके लिए तस्कर से लेकर गांव तक पूरा रैकेट बना हुआ है। बॉस का इशारा होते ही भांग की दुकानों के अलावा गांवों के गुर्गों को गांजे की खेप पहुंचा दी जाती है। यदि किसी ने इसकी सूचना पुलिस को दिया तो पुलिस कभी भी मौके पर नहीं पहुंचती। उल्टे पुलिस वाले खुद ही शिकायत कर्ता के बारे में तस्करों के गुर्गों को बता देते हैं। ऐसे में अब लोगों ने गांजा बिक्री की शिकायत भी पुलिस से करना बंद कर दिया है।
दोआबा में गांजे के अवैध कारोबार से जुडे़ कारोबारियों के चेहरे नए-पुराने होते रहे पर धंधा दिनों दिन लगातार बढ़ता जा रहा है। अब स्थिति यह हो गई है कि जिले की 42 भांग की दुकानों में गांजे का कारोबार इस तरह से हो रहा है जैसे कि उन्हें इसके लिए लाइसेंस प्राप्त है। यहां तक तो ठीक है कि भांग की आड़ में गांजे की बिक्री की जा रही है लेकिन गांव-गांव बिछे गांजा तस्कर के मकड़जाल ने सारी सीमाएं लांघ रखी हैं। दोआबा का कोई ऐसा गांव नहीं है जहां का एक या दो व्यक्ति इस कारोबार में लिप्त न हो। खास बात यह है कि कारोबार से जुड़े लोगों की सेटिंग इतनी तगड़ी है कि उन्हें प्रशासन की गतिविधियों की पल-पल की खबर रहती है। ऐसे में यदि उनकी आबकारी या स्थानीय पुलिस से लेन-देन को लेकर अनबन भी हो जाए तो जल्दी से कोई उनके स्टोर तक नहीं पहुंच पाता। यही कारण है कि चंद दिनों में कारोबारियों की कायापलट हो जाती है।
गांजा, अवैध शराब और स्प्रिट की बिक्री रोकने के लिए आबकारी विभाग की टीम गठित है। इस टीम का काम ही सिर्फ यह है कि वह दबिश देकर इन अवैध कारोबारियों पर अंकुश लगाते हुए जेल भेजे लेकिन ऐसा नहीं होता। कभी-कभार आबकारी टीम कच्ची शराब और स्प्रिट के दो-चार कारोबारियों के प्यादों की धर-पकड़ कर कोरम पूरा कर लेती है लेकिन आज तक गांजा की बिक्री करने वाले भांग के दुकानदार के खिलाफ कभी कार्रवाई नहीं हुई।
। गांजा तस्करों से इलाकाई पुलिस से लेकर एसपी, एएसपी और सीओ कार्यालय में ड्यूटी वाले सिपाही तक नेटवर्क में रहते हैं। यहां तक कि स्पेशल आपरेशन ग्रुप के सिपाहियों की जिले के गांजा कारोबारियों से दिनभर बात होती रहती है। ऐसे में यदि उच्चाधिकारियों ने किसी भी दुकानदार या गिरोह के सरगना के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश जारी किया तो उसे तत्काल खबर मिल जाती है। ऐसे में वह न केवल ठिकाने से गायब हो जाता है बल्कि पुलिस के संज्ञान में आए स्थान से गांजे की खेप भी हटा दी जाती है। यह काम आबकारी के सिपाहियों द्वारा भी किया जाता है। इसके चलते चाहकर भी गांजे के कारोबार पर अंकुश नहीं लग पा रहा है।
। अमर उजाला में शुक्रवार को भांग की दुकानों पर बेचे जा रहे गांजा और कारोबारियों के आबकारी अधिकारी कार्यालय में आवभगत की खबर प्रमुखता से प्रकाशित हुई। खबर छपने के बाद कारोबार बंद कराने की जगह इलाकाई पुलिस और आबकारी टीम कारोबारियों पर दिनभर मुट्ठी गर्म करने का दबाव बनाती रही। स्थिति यह रही कि एक भी दुकान पर छापा मारने के लिए पुलिस और आबकारी की टीम नहीं पहुंच सकी। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आबकारी और इलाकाई पुलिस गांजा बंद कराने के लिए कितनी संजीदा है।
भांग की किस दुकान में गांजा बिक रहा है यह मुझे बताना होगा। आज मेरी गाड़ी खराब है उसे मैं बनवा रहा हूं। गाड़ी बनने के बाद भांग की दुकानों में छापेमारी के बावत सोचा जाएगा।
बीपी मानिक, जिला आबकारी अधिकारी